मैं एक ऐसे भूतिया घर में रह चुकी हूं जहां के भूत ने हमारे लिए 'हैप्पी बर्थडे' गाया
उसकी दीवारों ने हमें कई संकेत दिए लेकिन हम ही नहीं समझ पाए
मैं पांच साल की थी जब हमारी फैमिली विशाखापटनम शिफ्ट हुई और हमें रहने के लिए एक ऐसा घर मिला जो कई सालों से खाली था। मेरे पिता नौसेना में थे, और हमें सरकारी घर मिलना था जो उस समय तक तैयार नहीं था और इसलिए कुछ समय हमें इस अस्थायी आवास में रहना था। एक शांत सुनसान गली के अंत में स्थित, तीन बेडरूम वाला एक मंजिला घर, जिसके चारों ओर एक विशाल कंपाउंड था। इसके एक तरफ फैला हुआ विशाल बरगद का पेड़ था, जिसकी मोटी, नुकीली शाखाएं सबसे आखिरी बेडरूम की छत पर जाकर रूकती थीं। दूर से देखने में तो यह हिंदी फिल्मों वाले किसी भूतिया घर की तरह प्रतीत हो रहा था।
जब मैं और मेरी मां पहली बार घर देखने गए तो पापा साथ नहीं थे। जैसे ही हमने जंग लगे कंपाउंड गेट को खोला, उसमें से एक लंबी, चरमराती हुई कराह निकली। अंदर घुसते ही एक चूहा हमारे पैरों के बीच से निकल कर भागा, हम चिल्लाते और लड़खड़ाते हुए पीछे हुए और वह एकाएक झाड़ियों में ना जाने कहां गायब हो गया। किसी तरह हिम्मत जुटाकर हम आगे बढ़े। बाहर उजाड़ पड़े बगीचे में एक छोटा सा झूला लटका हुआ था, जो हौले-हौले हिल रहा था। मुझे आज भी याद है उस झूले को देखकर मैं इतना खुश हो गई थी कि पलक झपकते ही इस भूतिया घर और चूहे का ख्याल मेरे दिमाग से निकल गया था।
पैरों तले चरमराती सूखी पत्तियों की आवाज़ ने हमारे कंपाउंड से होते हुए घर में दाखिल होने तक के सफर को और भी डरावना बना दिया था। लेकिन मुझे याद है कि घर में घुसते ही उसके बड़े, हवादार कमरों को देखकर हमारे उत्साह का कोई ठिकाना नहीं था। मैंने झट इधर-उधर भागना शुरू कर दिया, पर मां ने मुझे उनके आस पास ही बने रहने को कहा।
कुछ समय बाद, हम वहां रहने आ गए और इस नए घर और माहौल के साथ तालमेल बिठाने की कोशिश करने लगे। दिन में तो सबकुछ अच्छा लगता था, लेकिन रात में एक अजीब सा सर्द अहसास होने लगता, जो धीरे-धीरे आपके अंदर तक समा जाता और अनेक कोशिशों के बाद भी उस भाव से छुटकारा पाना असंभव हो जाता था। और कभी-कभी, जब एकदम सन्नाटा छा जाता था, तो मैं कसम खाकर कह सकती हूं कि मुझे फुसफुसाहटें सुनाई देती थीं – इतनी धीमी लेकिन इतनी पास, जैसे कोई मेरे पीछे खड़ा होकर मुझे कुछ बताने की कोशिश कर रहा हो जो मैं कभी समझ नहीं पाई।
यह अनुभूति बेहद डरावनी थी, लेकिन हम खुद को सांत्वना देते रहे कि यह कोई भूतिया घर नहीं है, बस एक पुराना घर है जिसमें छह साल बाद फिर से जान आई है और शायद उन आवाज़ों के पीछे भी कोई तार्किक व्याख्या छुपी हो।
अधिकतर शाम को, मैं आस पास रहने वाले दूसरे बच्चों के साथ खेलने चली जाती थी। लेकिन सूरज ढलने के बाद, मैं कभी अकेले घर जाने की हिम्मत नहीं कर पाई। मेरे घर की गली तक स्ट्रीट लाइट नहीं जाती थी और रात में बरगद के पेड़ की परछाइयां देखकर मेरे दिमाग के घोड़े दौड़ने लगते और मुझे चारों ओर डरावने राक्षस दिखाई देने लगते थे। मेरी मां ने ख़ास इस काम के लिए एक नैनी लगाई जो रोज़ मुझे घर तक छोड़ने आए। लेकिन, वो नैनी भी कभी एक पल ज्यादा के लिए हमारे घर के दरवाजे पर नहीं रूकती थी।
मेरे दोस्त हमेशा मेरे घर को भूतिया घर कहकर मुझे चिढ़ाते थे। इलाके में हर कोई इसे भूतिया घर ही समझता था, लेकिन मुझे कभी समझ ही नहीं आया कि ऐसा क्यों था। मैंने जब भी अपनी मां से पूछना चाहा, उन्होंने टालमटोल करके मेरा ध्यान कहीं और घुमा दिया।
जैसे-जैसे महीने बीतते गए, मुझे कभी भी घर के अंदर असुरक्षित महसूस नहीं हुआ। लेकिन यह अहसास कि इस घर में हमारे अलावा भी कोई/कुछ मौजूद है जो हर पल हमें देख रहा है, हमेशा मेरे साथ बना रहा।
एक शाम, मैं टीवी देखते-देखते लिविंग रूम के सोफे पर सो गई। अधकच्ची नींद में ऐसा लगा जैसे मां मेरे बालों को सहलाते हुए धीमी आवाज़ में फुसफुसा रही हो, “बेटा, उठो। रात के खाने का समय हो गया है।” मैंने नींद में ही गुहार लगाई, “मां, प्लीज़ मुझे थोड़ी देर और सोने दो।” उसने धीरे से लेकिन आग्रहपूर्वक दोहराया, “बेटा,आओ खाना खा लो।”
मजबूरन जब मैंने अपनी आंखें खोली तो वह मेरे पास ही खड़ी थीं, जाने-पहचाने से उनके काले रंग के टॉप में, और कोमल चेहरे और स्नेह से भरी आंखों के साथ मुझे देख रही थीं। मैंने एक पल के लिए अपनी आंखें फिर से बंद कर लीं। फिर जब मैं उठी और रसोई के दरवाज़े तक गई, तो मेरे कदम जैसे जड़ हो गए।
मेरी मां वहां खड़ी खाना बना रही थीं … लेकिन बिल्कुल अलग कपड़े पहने हुए।
मेरी सांस मेरे गले में अटक गई। “आपने इतनी जल्दी कपड़े कैसे बदल लिए?” मैंने फुसफुसाते हुए पूछा, मेरी आवाज़ ही नहीं निकल रही थी।
उन्होंने भौंहें सिकोड़ते हुए कहा, “ये तुम किस बारे में बात कर रही हो?”
मैं डर के मारे अंदर तक सिहर गई। जब मैंने उन्हें पूरा किस्सा सुनाया तो उनका चेहरा पीला पड़ गया। फिर उन्होंने जबरन हंसते हुए मेरी बात को टाल दिया। लेकिन मैं देख सकती थी कि उनकी नज़र घर में चारों ओर घूम रही थीं, मैंने उन्हें घर के दरवाज़े और खिड़कियां चेक करते हुए देखा। उन्होंने बाहर निकलकर, अंधेरे में भी तांक-झांक की लेकिन कहीं कुछ नहीं था। सालों बाद, उन्होंने स्वीकार किया कि उस रात वह कितना डर गई थीं। कहीं न कहीं उन्हें भी ऐसा महसूस होता था जैसे कोई उनपर हर समय नज़र रखे हुए है। उस दिन पहली बार मां को भी खटका हुआ की कहीं लोगों की भूतिया घर वाली बात में कोई सच्चाई तो नहीं है।
फिर मेरे भाई का बर्थडे आया। हम लिविंग रूम में बैठे, उससे फोन पर बात कर रहे थे, तभी अचानक से एक हल्की धुन हवा में गूंजने लगी। घर के अंदर कहीं पर ‘हैप्पी बर्थडे’ बज रहा था।
हमने हर जगह खोजा, भय के कारण हमारे शरीर कंपकपां रहे थे। पूरा घर छानने के बाद, आखिरी कमरे में हमें कुछ मिला – एक पुरानी इस्तेमाल की हुई म्यूज़िकल बर्थडे कैंडल, जो ना जाने कबसे एक दराज में पड़ी हुई थी। वह अपने आप बज रही थी, और इसकी भूतिया धुन रात के सन्नाटे में गूंज रही थी।
एक कैंडल, जिसे बहुत पहले फेंक दिया गया था, जिसकी बत्ती जल चुकी थी, जो पुराने धूल से सने कागज़ों के ढेर के नीचे दबी हुई थी, अचानक गाना शुरू कर देती है? जाहिर है, हमारे घर के भूत भी जश्न मनाने के शौक़ीन थे।
कभी-कभी, जब कोई नहीं होता था, तो भी हमें हॉल में पदचाप सुनाई देते थे। खाली कमरे में कुर्सी के हिलने की खड़खड़ाहट। मेरी मां बहुत समय तक इन सब बातों को अनदेखा करती रहीं, लगभग आठ महीने तक, जब आग लगी।
एक दिन, वह ऑफिस में थीं, मैं स्कूल में थी और हमारी घरेलू काम करने वाली किराने का सामान लेने बाहर गई हुई थी। तभी मां के पास हमारे घबराए हुए पड़ोसी का फोन आया।
“आपके घर में आग लग गई है।”
जब तक हम घर पहुंचे, आग की लपटों ने पूरे घर को अपने आगोश में ले लिया था, दीवारें काली हो गई थीं और काफी फर्नीचर जल चुका था। इससे पहले के कुछ हफ़्तों में, हमें चेतावनी के अजीबोगरीब संकेत मिल रहे थे – कभी-कभार धुंए का झौंका, और दीवारों पर छोटे-छोटे काले धब्बे जिन्हें मां पुराने दाग समझकर अनदेखा कर देती थीं। बाद में मेरी मां को याद आया कि उन्हें कई दिनों से माहौल में तनाव और भारीपन लग रहा था, जैसे कुछ बुरा होने वाला हो। फायर ब्रिगेड आई, लेकिन जांच के बाद, उन्हें कोई स्रोत नहीं मिला। कोई गैस लीक नहीं। कोई दोषपूर्ण वायरिंग नहीं। कुछ भी नहीं। बस हमारा घर, जैसे उसने तय कर लिया था कि अब इस घर में हमारा समय पूरा हो चुका है, और हमें नाटकीय तरीके से विदा कर दिया जाए।
मेरी मां आजतक यही सोचती हैं — वो जो भी था, क्या वह हमारी रक्षा कर रहा था, या हमें चेतावनी दे रहा था? उसने मुझे खाने के लिए जगाया और मेरे भाई को जन्मदिन की शुभकामनाएं दी, लेकिन उसने घर को भी जला दिया। हालांकि, उसने तब तक इंतज़ार किया जब तक हम घर से बाहर नहीं निकल गए।
कमरों से दिखाई देता, बरगद का वह विशाल पेड़, अपनी लंबी, काली परछाई के साथ, मुझे हमेशा से परेशान करता था लेकिन उस घर ने मुझे कभी भी दुर्भाव महसूस नहीं कराया।
इस वाकिये के बाद हम तुरंत ही उस घर से निकल गए। पहले होटल में रहे, फिर एक नए अपार्टमेंट में। सालों बाद, जब मैं वापस लौटी, तो पड़ोसियों ने मुझे बताया कि अब सब ठीक है। नए निवासियों ने कभी कोई शिकायत जाहिर नहीं की।
उन्हें लगता है ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि नए लोगों ने पूजा-पाठ करना शुरू किया। घर के लिए नहीं।
पेड़ के लिए।
आकांक्षा नारंग द्वारा प्राप्त जानकारी के आधार पर।
