ये महिला खिलाड़ी साबित करती हैं कि नई मांएं किसी सुपरहीरो से कम नहीं हैं
उसैन बोल्ट के गोल्ड मेडल रिकॉर्ड को ध्वस्त करने वाली एक महिला है, जो अभी 10 महीने पहले ही मां बनी थी
सूजे हुए पैर, मॉर्निंग सिकनेस और लॉफ़िंग बुद्धा की तरह दिखता हुआ पेट जिसे शायद हर कोई छूना चाहता है। और इन सब के साथ-साथ मां बनना जैसे आपके करियर के लक्ष्यों को कहीं पीछे धकेलता जाता है। यदि डिलीवरी के तुरंत बाद आप काम पर लौट जाती हैं तो आप हर पल ग्लानि महसूस करती हैं और यदि आप अपने बच्चे की देखभाल के लिए ब्रेक ले लेती हैं, तो कामकाजी दुनिया में ख़ुद को नए सिरे से साबित करने का डर हावी हो जाता है और आपको ख़ुद के प्रति ही आशंकाएं होने लगती हैं।
यह बात अलग होती, यदि आप 33 वर्षीय अमेरिकी रनर एलिसन फेलिक्स होतीं और आप उसैन बोल्ट के रिकॉर्ड को तोड़ कर दुनिया में 12 वर्ल्ड गोल्ड चैम्पियनशिप मेडल्स जीतने वाली पहली महिला खिलाड़ी बन गई होतीं। वो भी अपने बच्चे को जन्म देने के केवल 10 महीने के बाद।
या फिर आप 32 वर्षीय जमैकन रनर शेली-एन फ्रेजर-प्रिस हों, जिसने दोहा में आयोजित आईएएएफ़ वर्ल्ड चैम्पियनशिप में 100 मीटर की फ़ाइनल रेस जीती- और वह ऐसा करने वाली दुनिया की सबसे उम्रदराज़ महिला खिलाड़ी बनी। एक दो वर्ष के बच्चे की मां, जो अपनी जीत के कुछ मिनट बाद ही अपने बच्चे के साथ फील्ड में दिखाई दे रहीं थी।
खेल जगत में, खेल दिग्गजों द्वारा बनाई गई, पुराने समय से चली आ रही मैटरनिटी पॉलिसीस को इस तरह ध्वस्त कर रहीं इन महिला खिलाड़ियों को देख कर बहुत हैरानी होती है। ओलंपिक रनर फ़ेलिक्स, ऐलिसिया मोन्टैनो और कारा गॉउचर ने प्रेग्नेंसी पर ‘नाइकी’ की पॉलिसी के खिलाफ आवाज़ उठाई और इस विषय पर जांच की मांग की। पता लगा कि यह कंपनी, जो स्पोर्ट्स में महिलाओं को बढ़ावा देने के लिए जानी जाती है, प्रेग्नेंसी के दौरान या उसके बाद उनकी तनख़्वाह में कमी (फ़ेलिक्स के मामले में 70 प्रतिशत तक) कर देती है।
इतिहास गवाह है कि महिलाएं सब कुछ कर सकती हैं और काफी समय से करती भी आ रही हैं। वर्ष 2017 में, सेरेना विलियम्स ने जब ऑस्ट्रेलियन ओपन जीता था, वे आठ हफ्ते की प्रेग्नेंट थीं। उसी वर्ष, छह महीने की प्रेग्नेंट डाना वॉल्मर ने, राष्ट्रीय खेलों में 50 मीटर की फ्रीस्टाइल में भाग लिया था। अब तो कई दशकों से, भारतीय महिला खिलाड़ी, प्रेग्नेंसी और उसके बाद के प्रदर्शन से जुड़ा यह मिथक तोड़ती चली आ रही हैं। रनर रचिता मिस्त्री, जब वर्ष 1955 की एशियन ऐथ्लेटिक्स चैम्पियनशिप की ट्रेनिंग ले रही थीं, तब उन्हें पता चला कि वे प्रेग्नेंट हैं। वे मानती हैं कि वे अपने करियर के शिखर पर मां बनने के बाद ही पहुंचीं – वर्ष 1997 में रचिता राष्ट्रीय विजेता बनीं, वर्ष 1998 में उन्होंने एशियन गेम्स में मेडल जीता और फिर वर्ष 2000 में 100 मीटर की रेस में नया राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाया। “मां बनने के बाद मेरा प्रदर्शन बेहतर, बेहतर, बेहतर ही होता गया। मैं मां बनना चाहती थी। मैं मां बनी। मैं अपनी बेटी के लिए यह सब करना चाहती थी, और मैंने किया,” रचिता ने स्क्रोल को दिए एक इंटरव्यू में कहा था। एक बॉक्सर और तीन बच्चों की मां, मैरी कॉम वो पहली भारतीय बॉक्सर हैं, जिन्होंने वर्ष 2018 के कॉमन वेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल जीता और फ़िलहाल वे वर्ष 2020 के ओलंपिक्स की तैयारी कर रही हैं, जहां बेशक़ वे एक बुलंद दावेदार होंगी।
क्या प्रेग्नेंसी महिला खिलाड़ियों को रोकने का काम करती हैं? एक गायनोकोलॉजिस्ट इस मिथक को दूर कर रही हैं
हालांकि स्पोर्ट्स वो अकेली इंडस्ट्री नहीं है, जहां मां बनने के बाद महिला खिलाड़ी को साइड लाइन किया जाता है या निंदनीय नज़रों से देखा जाता है। एक खिलाड़ी होने के लिए शारीरिक जरूरतें और प्रेग्नेंसी के बाद होने वाले प्रभाव, इन कंपनियों के लिए महिला खिलाड़ी को बाहर करने का एक आसान बहाना है। आर्टेमिस हॉस्पिटल (गुड़गांव) की चेयरपर्सन व एचओडी, ऑब्स्टेट्रिक्स और गायनोकोलॉजी, डॉ अंजली कुमार के मुताबिक़, शायद यह लंबे समय से चली आ रही इस ग़लत धारणा के चलते होता है कि प्रेग्नेंट महिला को कठोर शारीरिक गतिविधियों से दूर रहना चाहिए। “बहुत से लोगों को लगता है कि कसरत करने से गर्भपात हो सकता है। यह बात सही नहीं है। महिलाएं अपने सामान्य वर्कआउट रूटीन के अनुसार एक्सरसाइज़ करना जारी रख सकती हैं, बस ज़रूरत से ज़्यादा नहीं करें। हां, आप हमेशा से जो करती आ रही हैं, उससे कुछ नया और कठोर वर्कआउट करना अच्छा आइडिया नहीं है,” डॉ कुमार समझाती हैं। एक प्रशिक्षित खिलाड़ी, जो पहले से ही हाइ-इन्टेंसिटी वर्कआउट की आदी हैं, वो उन्हें करना जारी रख सकती हैं, जब तक कि उसकी गायनोकोलॉजिस्ट उसे ऐसा करने से मना न करे।
ओलंपिक मेडल विजेता मैरी कॉम को हराना नामुमकिन है
यह साबित हो चुका है कि एक प्रेग्नेंट महिला की सहन-शक्ति किसी सुपर एथलीट के बराबर हो जाती है। इस हिसाब से देखा जाए तो, यदि कोई असल में एक सुपर एथलीट हैं, तो मुझे लगता है वह प्रेग्नेंट महिला खिलाड़ी किसी सुपरवुमन से कम नहीं होगी। इसके पीछे विज्ञान का कौन-सा तर्क है? डॉ कुमार समझाती हैं कि प्रेग्नेंसी के दौरान एक महिला का शरीर, अपने भीतर बढ़ती ऑक्सिजन डिमांड को पूरा करने के लिए, कई तरह के बदलावों से गुज़रता है। एक प्रेग्नेंट महिला में खून की मात्रा किसी सामान्य इंसान की तुलना में 50 प्रतिशत ज़्यादा होती है, उसका कार्डिऐक आउटपुट (हृदय के द्वारा पंप किया जाने वाला रक्त) प्रेगनेंसी के दौरान 10 प्रतिशत तक बढ़ जाता है और ब्लड सेल्स की संख्या भी 18 प्रतिशत तक बढ़ जाती है। हॉर्मोन्स में होने वाले बदलाव (जिसमें एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरॉन का बढ़ता स्तर भी शामिल है) से ऑक्सिटोसिन की मात्रा भी बढ़ती है, जो दर्द सहने की शक्ति को बढ़ा देता है। “ये शारीरिक बदलाव प्रेग्नेंसी के बाद भी सालभर तक बने रह सकते हैं, जो आम धारणा के विपरीत किसी भी महिला खिलाड़ी की सहन-शक्ति और उसके बेहतर प्रदर्शन की संभावनाओं को बढ़ा देते हैं,” डॉ कुमार कहती हैं।
इन दो महिला खिलाड़ियों द्वारा रिकॉर्ड तोड़ देने की ख़बर सुनकर, अभी-अभी मां बनी मेरी एक पुरानी दोस्त ने, इन्स्टाग्राम पर मुझसे कहा कि वैसे तो वह किसी भी लिहाज़ से एक एथलीट नहीं है, सिवाय इसके कि खाना ख़त्म करने की स्पीड में उसका कोई मुक़ाबला नहीं कर सकता, वो भी इसलिए कि कहीं उसका बच्चा खाना फेंकना शुरू न कर दे – पर फिर भी वो इन दोनों महिला खिलाड़ियों के बारे में जानकर बहुत ऊर्जावान महसूस कर रही है। हमको अब ख़ुद को साबित करने की जरूरत नहीं है, हम समय-समय पर यह करती आ रही हैं। लेकिन इस बात की कल्पना तो कीजिए कि बस, ज़रा-से सहयोग से हम क्या कुछ कर सकते हैं। जितने लिंगभेद का सामना महिलाओं को करना पड़ता है, उतना पुरुषों को नहीं करना पड़ता, लेकिन हम फिर भी अपनी कमज़ोर समझी जाने वाले परिस्थितियों को अपनी ताकत में बदलना बख़ूबी जानते हैं। विश्वास नहीं होता तो उसैन बोल्ट से पूछ के देख लीजिए।
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