भारत में अबॉर्शन - वो सब जो आप जानना तो चाहते हैं पर पूछने से कतराते हैं
टॉप गायनोकोलॉजिस्ट डॉ नोज़ेर शेरिअर हमारी पूर्वनिर्धारित धारणाओं को परत दर परत खोल रहे हैं
पब्लिक में अबॉर्शन शब्द का जिक्र होते ही ऐसा लगता है जैसे आसपास मौजूद सभी लोगों को सांप सूंघ गया हो और मानो सब आपको ही घूर रहे हों। इस साल जनवरी में, यूनियन कैबिनेट ने एक लैंडमार्क मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ़ प्रेगनेंसी (अमेंडमेंट) बिल 2020 पास किया, जिसके अनुसार अब प्रेगनेंसी के 24वे सप्ताह तक भारत में अबॉर्शन करवाया जा सकता है।
यह एक ऐतिहासिक निर्णय था जो औरतों की हेल्थ की रक्षा के लिए बहुत अहम है, लेकिन इससे जुड़ी कई बातें अस्पष्ट थी।
दुनिया में हर साल 56 मिलियन इंड्यूस्ड अबॉर्शन होते हैं और उनमें से करीब 15.6 मिलियन अबॉर्शन केवल भारत में होते हैं। इस तथ्य के बावजूद भी, यह प्रक्रिया गलत जानकारियों और निर्णय की परतों के नीचे दबी हुई है। अपने शरीर पर खुद का अधिकार होना, अभी तक सही और गलत के बीच में ही झूल रहा है, ऊपर से हमारी धार्मिक मान्यताएं और पुरुष प्रधान सोसाइटी इस गन्दगी को और बढ़ावा दे रही हैं।
हाल ही में, भारत के प्रतिष्ठित गायनोकोलॉजिस्ट, डॉ नोज़ेर शेरिअर ने लीज़ा मंगलदास को दिए अपने एक इंटरव्यू में, भारत में अबॉर्शन के टॉपिक पर कुछ बातें साफ़ करने की कोशिश की।
वो 5 तथ्य जो हमने भारत में अबॉर्शन के बारे में जाने:
क्या भारत में अबॉर्शन लीगल हैं?
हां, मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ़ प्रेगनेंसी एक्ट के तहत, प्रेगनेंसी के 24वे सप्ताह तक भारत में अबॉर्शन लीगल है। 20वे सप्ताह तक, अगर अबॉर्शन कराना हो, तो कानूनी तौर पर किसी भी महिला के पास कम से कम एक मेडिकल एक्सपर्ट का परमिशन लेटर होना चाहिए। 20 से 24 सप्ताह के बीच, महिला के पास दो डॉक्टर्स का परमिशन लेटर होना आवश्यक है।
इस प्रक्रिया के लिए एलिजिबल फैक्टर्स?
हमारा कानून इस बात पर ज़ोर देता है कि अबॉर्शन कराने के लिए कोई जायज़ कारण होना ज़रूरी है। हालांकि, इन कारणों का दायरा बहुत व्यापक है, और इसके तहत लगभग हर महिला अबॉर्शन करा सकती है।
महिला के जीवन को खतरा: ऐसे मामलों में, किसी भी समय प्रेगनेंसी को टर्मिनेट किया जा सकता है, कितने सप्ताह हुए हैं, यह कोई मायने नहीं रखता। दूसरा कारण है यदि महिला की मेन्टल या फिज़िकल हेल्थ खतरे में हो, हालांकि यह क्लॉज़ थोड़ा अस्पष्ट है।
एम्ब्रेयो या फ़ीटस की मेन्टल या फिज़िकल हेल्थ खतरे में हो: उदाहरण के लिए, यदि प्रेगनेंसी के दौरान मां को जर्मन मीसल्स हो जाएं, तो एक डॉक्टर को यह साबित करने की ज़रुरत नहीं कि इससे बच्चे में एब्नोर्मलिटी हो सकती है, वह मां की बीमारी के आधार पर प्रेगनेंसी टर्मिनेट कर सकता है।
कॉन्ट्रासेप्शन फेल हो जाने पर: यह थोड़ा अलग है क्योंकि 1971 एक्ट के अनुसार, कॉन्ट्रासेप्शन फेल हो जाने पर अबॉर्शन केवल विवाहित कपल्स पर लागू होता है। यह अविवाहित कपल्स पर लागू नहीं करता, हालांकि अमेंडेड बिल शायद इस नियम को बदल सकता है।
क्या एक अविवाहित महिला भारत में अबॉर्शन करा सकती है?
हां, हमारे देश में अबॉर्शन कराने के लिए, किसी महिला का विवाहित होना ज़रूरी नहीं है। 18 साल की उम्र के बाद, किसी भी सिंगल महिला को अपनी मेन्टल या फिज़िकल हेल्थ को प्रभावित कर रही प्रेगनेंसी को टर्मिनेट कराने के लिए अपने पेरेंट्स या पति की अनुमति लेने की कोई आवश्यकता नहीं है। पर, इसके लिए भी डॉक्टर की परमिशन का होना ज़रूरी है।
अबॉर्शन के लिए किस तरह की प्रक्रियाएं होती हैं?
प्रेगनेंसी के शुरूआती दिनों में, एक महिला मेडिकल अबॉर्शन का सहारा ले सकती है जिसमें सिर्फ दवाएं लेनी होती हैं। प्रेगनेंसी टर्मिनेट करने के लिए मिफेप्रिस्टोन और मिसोप्रोस्टोल युक्त टेबलेट्स को दो चरणों में लिया जाता है।
सक्शन एस्पिरेशन दूसरा ऑप्शन है। यह एक सर्जिकल प्रक्रिया है जिसमें सक्शन से प्रेगनेंसी को हटा दिया जाता है।
क्या अबॉर्शन दर्दनाक और सुरक्षित होते हैं?
हां, यह दर्दनाक हो सकते हैं, लेकिन इस प्रक्रिया के बाद होनी वाली तकलीफ को कम करने के लिए दवाएं उपलब्ध हैं। शेरिअर इस दर्द की तुलना हैवी पीरियड्स के दौरान होने वाले दर्द से करते हैं।
पहले ट्राईमेस्टर में, जब औरतें सर्जिकल अबॉर्शन के लिए आती हैं, उन्हें जनरल या लोकल एनेस्थीसिया दिया जाता है जिससे प्रक्रिया के दौरान दर्द नहीं होता।
हालांकि, दूसरे ट्राईमेस्टर में, इसका दर्द बिलुकल लेबर (प्रसव) में होने वाले दर्द के समान होता है। इसके लिए दर्द निवारक दवाएं दी जाती हैं, और कभी-कभी, एपिड्यूरल का भी उपयोग किया जाता है। यह आपके हेल्थ केयर क्लिनिक में उपलब्ध सुविधाओं पर निर्भर करता है।
सुरक्षा के लिहाज से, शेरिअर कहते हैं कि किसी भी स्टेज पर अबॉर्शन कराने की प्रक्रिया बच्चे को जन्म देने की प्रक्रिया से कहीं गुना ज़्यादा सुरक्षित है। और शुरआती दिनों में किये जाने वाले अबॉर्शन तो डॉक्टर्स की ऑब्स्टेट्रिशन प्रैक्टिस में सबसे सुरक्षित माने जाते हैं।
यह याद रखना बहुत महत्वपूर्ण है कि अबॉर्शन, खासतौर से जो प्रेगनेंसी के शुरूआती दिनों में किये जाते हैं, वह महिला की लॉन्ग-टर्म फर्टिलिटी को प्रभावित नहीं करते।
नीचे दिए गए वीडियो को देखें, और अपनी जानकार महिलाओं के साथ भी शेयर करें ताकि वह अपने शरीर से सम्बंधित कोई भी फैसला लेने से पहले उचित जानकारी से पूरी तरह लैस हों।
जैसा कि डॉ शेरिअर का मानना है, कोई भी औरत अबॉर्शन कराने का फैसला बेवजह नहीं लेती। अगर आपको कभी इसकी ज़रूरत महसूस हो और आप इसे अपनाने में संघर्ष कर रहे हों, तो खुद को शांत करने के लिए याद करें कि आप अकेली नहीं हैं, आप दुनिया की उन 56 मिलियन बहनों में से एक हैं।
