क्यों हम आज भी पुरुषों के साथ समझौता करते हैं, इस उम्मीद में कि वे बदल जाएंगें?
वह उसके अंदर की चिंगारी को बुझा देगा
पिछले कुछ दिनों में, मैंने कोई बहुत ज़्यादा रोमांटिक फ़िल्में नहीं देखीं, क्योंकि ऐसा लग रहा था जैसे अच्छी फ़िल्में बननी ही बंद हो गई हैं। शायद इसीलिए पिछले हफ़्ते, मैं हाल ही में रिलीज़ हुई नेटफ्लिक्स फ़िल्म ‘आप जैसा कोई’ देखने के लिए बेहद उत्साहित थी, जिसमें फ़ातिमा सना शेख़ के साथ आर. माधवन भी हैं, जो मेरे पसंदीदा अभिनेताओं में से एक हैं। मैंने इसके ट्रेलर देखे थे और मैं तैयार थी कि हर रोमांटिक फिल्म की तरह इसमें भी वही सब होगा: व्यक्तित्वों का टकराव, उम्र के फर्क से जुड़े संघर्ष और गलतफहमियां। लेकिन जिस बात के लिए मैं बिलकुल तैयार नहीं थी, वह यह कि फ़िल्म का मूल कथानक आगे जाकर ऐसा मोड़ ले लेगा: फिल्म की हीरोइन जो प्यार की तलाश में हैं, एक ऐसे समाज में जहां पुरुषों को श्रेष्ठ माना जाता है, वह चुनौतियों और असहमतियों का सामना करते हुए भी अपने विचारों पर अडिग रहती है लेकिन अंत में हार मान लेती है, क्यों? क्योंकि उसे उम्मीद है कि उसका पार्टनर उसके लिए बदल जाएगा।
यह फिल्म मधु और श्री की कहानी है। मधु एक प्रगतिशील परिवार में पली-बढ़ी, महत्वाकांक्षी, कॉंफिडेंट फ्रेंच टीचर है; और श्री, एक शिष्ट संस्कृत टीचर, जो अपनी सरलता और ईमानदारी पर गर्व करता है। वह पहली बार अरेंज मैरिज के हिसाब से एक दूसरे को जानने के लिए मिलते हैं और शुरुआत में उनका रिश्ता कुछ समय तक बहुत अच्छा चलता है लेकिन जल्द ही वे एक दूसरे की पर्सनल सीमाओं का उल्लंघन करना शरू कर देते हैं, चरित्र पर कीचड़ उछालने लगते हैं, और फिर सामने आती ही पुरुषों के प्रभुत्व के गहरे दलदल में फंसें हमारे समाज की सच्चाई। यह तब शुरू होता है जब उन दोनों को पता चलता है कि वे पहले भी मिल चुके हैं – वर्चुअली, एक ऐसे ऐप पर, जहां लोग फोन सेक्स की तलाश में जाते हैं। दोनों ने उस ऐप पर साइन-अप किया था और बहुत मजा भी किया था। लेकिन जैसे ही मधु इस बात का खुलासा करती है कि उस ऐप वाली महिला वही है, तो श्री परेशान हो जाता है और उस पर बरसने लगता है जबकि वे दोनों उसमें बराबरी से शामिल थे। उसका तर्क? पुरुष तो ऐसे ही होते हैं, लेकिन एक महिला को कई लोगों के लिए यौन रूप से उपलब्ध नहीं होना चाहिए। वह उनके रिश्ते को वही समाप्त कर देता है, और मधु इस अच्छे-खासे दिखने वाले आदमी की छोटी सोच और दुस्साहस पर अचंभित रह जाती है।
मधु बहुत व्याकुल हो जाती है। यह पहली बार नहीं था जब उसका सामना किसी ऐसे पुरुष से हो रहा था जिसके सेक्स को लेकर दोहरे मानदंड थे। उसकी अपने पूर्व प्रेमी, नमित से ब्रेकअप करने की वजह यही थी क्योंकि सेक्स से पहले वह जानना चाहता था कि क्या वह एक वर्जिन है। इस नाजुक दौर से गुजर रही मधु एक बार फिर श्री के संपर्क में आती है और वह उसके पास वापस आने का प्रयास करता है। इस आश्वासन के साथ कि वह एक प्रगतिशील पुरुष बनने की कोशिश करने के लिए तैयार है। मधु उसे माफ़ कर देती है और वे फिर से एक साथ हो जाते हैं। और हमारी मधु, उसके बदलने की उम्मीद के साथ, रिश्ते में समझौता कर लेती है।
जब सादगी के भेष में छलावा हो
फिल्म में, श्री को एक सभ्य पुरुष के रूप में पेश किया गया है—एक बेहद जटिल और खूबसूरत भाषा का शिक्षक, जिसे लोग एक शांत और स्थिर व्यक्तित्व का धनी मानते हैं। लेकिन वह अक्सर बड़ी सहजता से ऐसी अपमानजनक बातें कह देता है जो व्याकुल कर देती हैं। वह मधु को उस डेटिंग ऐप पर होने के लिए उलाहनाएं देता है जिसे वह खुद इस्तेमाल कर रहा था। ऐप पर मधु की गतिविधियों को वह “अनजान पुरुषों को सेक्स सर्विस देने” (यानी सेक्स वर्क) का आरोप लगाता है, जबकि वह खुद ऐसे चाल-चलन में सम्मिलित था, लेकिन फिर भी उसे “चरित्रहीन” बुलाता है। चलो, मान लिया जाए कि एक सीधा-साधा, प्यारा सा पुरुष जिसका फलर्टिंग से दूर-दूर तक वास्ता ना हो, एक सेफ चॉइस होगी। लेकिन चाहे आप इंग्लिश पसंद करते हो या संस्कृत, पीढ़ियों से चली आ रही सामाजिक परम्पराएं पुरुषों का साथ इतनी आसानी से नहीं छोड़ती।
हां, वह अपने उस दकियानूसी भाई जितना बुरा नहीं है जो श्री की मां-समान भाभी को सबके सामने जलील करके उनके साथ बुरा व्यवहार करता है – लेकिन क्या उसे इसके लिए मेडल मिलना चाहिए? आप पुरुषों को अपनी बढ़ाई करते पाएंगे कि वे कितने शानदार पार्टनर हैं क्योंकि उन्होंने कभी चीटिंग नहीं की। पिताओं की तारीफ़ों की बौछार होगी क्योंकि उन्होंने एक डायपर बदला, जबकि माएं तो हमेशा से यही करती आ रही हैं। कई पुरुषों को लगता है कि वे थोड़े बहुत जो भी प्रयास कर रहे हैं, उन्हें उनके लिए भी सम्मान मिलना चाहिए और मुझे यकीन है कि मधु ने भी यही सोचकर समझौता कर लिया।
इमेज: फ़िल्म ‘आप जैसा कोई’ का एक स्टिल
वह बहुत जाना-पहचाना सा है
श्री कोई काल्पनिक खलनायक नहीं है। आप ऐसे लोगों को हर जगह देख सकते हैं – उस ऑफिस सहकर्मी में जो औरतों का “वोक अर्थात जागरूक” होना अपमानजनक समझता है, उस मेल फ्रेंड में जो मज़े-मज़े में अपने “हाई बॉडी काउंट अर्थात बहुत सारे सेक्षुअल पार्टनर होने” का बखान करता है, उस आदमी में जो दावे करता है कि वह महिलाओं का सम्मान करता है लेकिन उनको मिले अधिकार क्षेत्र से चिढ़ता है। यह वास्तविकता विचलित करने वाली है, और इस फिल्म में यह बखूबी प्रदर्शित किया गया है कि कैसे पुरुष अपनी सरलता को हथियार बनाकर औरतों पर इस्तेमाल करते हैं, कैसे जब महिलाएं उनके आदर्श मानकों पर खरी नहीं उतरतीं तो इस दयालु व्यक्ति की क्रूरता उभर कर सामने आ जाती है।
श्री अपने परिवार के लिए एक संस्कारी बहू चाहता है, लेकिन अपने भाई के दुर्व्यवहार को अनदेखा करता रहता है। उसका मानना है कि “पारंपरिक” होने से उसे नैतिक अधिकार मिलता है कि वो सही और गलत का फैसला कर सके, और उसी अधिकार के तहत वह मधु को उन गलतियों के लिए माफ़ करता है जो मधु के अनुसार गलत थी ही नहीं। अगर वह मधु से इस बात के लिए नाराज़ होता कि उसने श्री को अपनी पहली मुलाक़ात के बारे में अंधेरे में रखा, तो मैं फिर भी समझ सकती हूं। लेकिन उस मुलाक़ात के लिए उसे ‘माफ़’ करना? यह क्या बात हुई। मधु का यह कहना कि वह उसे माफ़ करने की स्थिति में नहीं हैं, बिलकुल वाजिब था। और जब उसने प्यार से मधु से कहा कि आगे से वह जो चाहे कर सकती है, लेकिन एक सीमा के अंदर, तो मधु पूरे कॉन्फिडेंस के साथ उसे यह याद दिलाती है कि उसे अपनी सीमाएं खुद तय करने का पूरा अधिकार है। श्री के चेहरे पर उसकी उलझन आप साफ़ देख सकते थे क्योंकि एक औरत की ऐसी सोच उसके लिए बिल्कुल नई थी। मैं बहुत खुश हूं कि फ़िल्म ने सेक्सिस्म अर्थात लिंगभेद के इतने सूक्ष्म पहलू को छुआ और मधु ने इस पर आवाज़ उठाई।
लेकिन यदि आपको लगता है कि आखिर बॉलीवुड ने सेक्सिस्ट ढर्रे से हटकर फ़िल्में बनाना सीख लिया है, तो दोबारा सोचिए। फिल्म का सबसे विचलित करने वाला हिस्सा यह है कि कैसे श्री बार-बार मधु की सीमाओं का उल्लंघन करता है, और फ़िल्म में उसके इस बर्ताव को प्यार के रूप में प्रदर्शित किया गया है। वह बिन बुलाए उसके ऑफिस पहुंच जाता है, उसकी जासूसी करता है, और जब वह अपने एक्स-लवर से मिलने जाती है तो श्री उसका पीछा करता है। अगर यह एक थ्रिलर फिल्म होती, तो हम इसे वही समझते, जो यह है: जुनून। मुझे इसमें फ़िल्म “रहना है तेरे दिल में” (2001) वाले मैडी की झलक दिखाई दे रही थी। उस समय मैं छोटी थी और शायद इसलिए समझ नहीं सकी कि यह जुनूनी प्रेमी वाला ढर्रा एक बहुत बड़ा खतरा है, लेकिन अब मैं इसे साफ़ देख पाती हूं। लेकिन चूंकि फ़िल्म में इस जुनून को सॉफ्ट लाइटिंग और रोमांटिक म्यूज़िक की आड़ में प्रस्तुत किया है, यह उसे एक निष्ठावान प्रेमी के रूप में पेश करते हैं।
घाटे का सौदा
जिस दौरान श्री अपने ‘खुद को हमेशा सही मानने वाले’ दंभी बर्ताव पर अड़ा रहता है, मधु के एक्स-लवर नमित की फिर से एंट्री होती है, जो अपने पिछले सेक्सिस्ट व्यवहार के लिए उससे माफ़ी मांगता है। इस मोड़ पर फ़िल्म की कहानी मधु को दो गलत आदमियों में से एक को चुनने के लिए उकसाती है। यह सीन बड़ा गुस्सा दिलाने वाला था, क्योंकि उन दोनों में से कोई एक ही क्यों होना चाहिए? फिल्म इसे ऐसे क्यों प्रस्तुत कर रही है जैसे अब उसे सिक्का उछालकर मॉडर्न पैकेजिंग में लिपटी पितृसत्ता (पैट्रिआर्की) और खादी में लिपटी पितृसत्ता (पैट्रिआर्की) में से एक का चयन करना है? मधु ऐसे आदमी से, जो यह कहता है कि वह बदलने की कोशिश करेगा, कहीं ज़्यादा की हक़दार है।
एक आदर्श फिल्म – जैसे क्वीन (2013) में, ठुकराई दुल्हन अंत में खुद को चुनती है – ऐसे ही मधु भी उन दोनों को छोड़कर आगे बढ़ सकती थी, नए सिरे से खुद को खोजती, और समझती कि किसी भी पार्टनरशिप की शुरुआत आपकी मन की शांति की कीमत पर नहीं होनी चाहिए। लेकिन ‘आप जैसा कोई’ फ़िल्म हमें याद दिलाती है कि वास्तविकता हमेशा इतनी उदार नहीं होती। बहुत सी औरतें समझौता कर लेती हैं, इसलिए नहीं कि वह बेहतर की परिभाषा नहीं समझतीं, बल्कि इसलिए क्योंकि वे यह उम्मीद लगा-लगाकर थक चुकी होती हैं कि उन्हें उनकी बराबरी का कोई मिलेगा। और उन्हें इस बात से संतुष्ट होना पड़ता है कि जो मिल रहा है संभव है कि थोड़ा कम बुरा होगा लेकिन बिलकुल गए-गुज़रे से तो बेहतर ही होगा।
इमेज: फ़िल्म ‘आप जैसा कोई’ का एक स्टिल
मधु का समझौता कहीं उसे भारी तो नहीं पड़ेगा
एक पल को ऐसा लगता है जैसे श्री उसके नज़रिए को समझ गया है। वह माफ़ी मांगता है, उसकी बातें सुनता है, और चिंतन करता हुआ प्रतीत होता है। लेकिन सोचने की बात यह है: क्या एक वार्तालाप से उसका बरसों पुराना नज़रिया बदल सकता है? वह व्यक्ति जो बड़ी आसानी से एक बार “चरित्रहीन” कह सकता है, शायद यही बात फिर से कहेगा। अगली बार शायद इन शब्दों में नहीं कहेगा, लेकिन जब उसके नाज़ुक अहंकार को ठेस पहुंचेगी, तो यह कहीं ना कहीं उसकी राय, नाराज़गी या अपव्यवहार में झलकेगा। झगड़े का अस्थायी समाधान इस समस्या का हल नहीं है; यह एक ऐसी मांसपेशी के समान है जो आप समय के साथ विकसित करते हैं। और श्री को जितना हमने देखा और समझा है, उससे तो लगता है कि उसने वर्कआउट अभी शुरू ही किया है।
जब मधु ने श्री के साथ रहने का फैसला किया, मधु ने केवल एक पार्टनर नहीं चुना बल्कि एक इमोशनल ट्यूटर, थेरेपिस्ट, कल्चरल ट्रांसलेटर के फुल-टाइम जॉब के लिए भी साइन-अप कर दिया, और साथ ही घर के खर्चे उठाने की आधी जिम्मेदारी भी अपने सर पर ली क्योंकि, उन दोनों में, वह ज़्यादा कमा रही थी। यहां, श्री अपनी सुविधा के अनुसार अपने स्वामित्व को बांटता नज़र आता है। उसे एक महिला का अपनी इच्छानुसार सेक्षुअल प्लेज़र लेने में आपत्ति है, लेकिन अगर वह उस पर से घर चलाने का दबाव कम कर रही है तो उसे कोई आपत्ति नहीं है। इस रिश्ते की नींव शुरू से ही हिली हुई प्रतीत होती है। मधु फाइनेंशियली अधिक स्वतंत्र, सेक्षुयली ज़्यादा कॉंफिडेंट और इमोशनली आत्म-जागरूक है। हमने उसे अपनी बात कहते, ज़िम्मेदारी लेते, अपनी शर्तों पर ज़िंदगी को बेबाक जीते देखा। लेकिन जब उसे पता चलता है कि श्री जैसा औसत दर्जे का आदमी उसे किस नज़र से देखता है, तब उसकी प्रतिक्रिया क्या होती है? हम उसे रोते हुए और उसके अंदर की चिंगारी को बुझते हुए अपनी आंखों से देख सकते हैं।
अगर हमें ऐसे रिश्ते के भविष्य की कल्पना करनी हो, तो यह आगे जाकर क्या मोड़ लेगा? जब बच्चे होंगे तब क्या होगा? जब ससुराल वाले उम्मीदें लगाऐंगे? जब वह करियर में आगे बढ़ना चाहेगी और उसे प्रतिरोध की नहीं, बल्कि समर्थन और सपोर्ट की ज़रूरत होगी? क्या श्री जैसा पुरुष उस समय भी उसे समझने और उसके अनुकूल परिवर्तन करने के लिए तैयार होगा, या वह फिर से अपने सीधे-सादे पारंपरिक मूल्यों में सिमट कर रह जाएगा?
फ़िल्म हमें वास्तविकता का आईना दिखाती है
फ़िल्म इस बात पर प्रकाश डालती है कि जब महिलाएं समाज के बनाए ढांचे को तोड़कर बाहर निकलती हैं, तो सीधे-सादे, भले और प्यारे पुरुष भी कितनी जल्दी कटु हो जाते हैं। यह उजागर करती है कि समाज का नज़रिया उन महिलाओं के प्रति कितना कठोर है जो धोखा देती हैं, या जो अपनी इच्छाओं को खुल कर व्यक्त करती हैं, या जिनका कोई अतीत होता है। उनको कितना धिक्कारा जाता है जबकि उनके साथी पुरुष भले ही वही सब कर रहे हों या उनसे भी ज़्यादा बुरा कर रहे हों, लेकिन बड़ी सफाई से बच निकलते हैं। और फिर, बहुत आक्रोश महसूस होता है, जब सच का आईना दिखाने के बाद भी, फ़िल्म का अंत हमें उसी रूढ़िवादिता में फिर से धकेल देता है क्योंकि अंत में मधु श्री के साथ ही समझौता कर लेती है, इस उम्मीद में की वह बदल जाएगा।
पीढ़ियों से चले आ रहे, पुरुषों के इस दोगले बर्ताव को हमारा समाज नार्मल मानता है, यही वजह है कि जो पुरुष खुलेआम अपव्यवहार, गाली-गलौज या मारपीट नहीं करते, उनके साथ समझौता कर लेने में औरतें अपनी खुशकिस्मती समझती हैं। लेकिन अगर आप गौर से देखें, तो आपको पता चलेगा कि समस्या सिर्फ़ श्री और उनके भाई जैसे पुरुष नहीं है। यह पूरा इकोसिस्टम है जो महिलाओं को क्षमा करने, धैर्य रखने और हर परिस्थिति को अपनाने और खुद को उसके अनुसार ढालने जैसे गुण सीखने के लिए बचपन से तैयार करता है जबकि पुरुष यह सीखते हैं कि खुद में थोड़े से बदलाव करके वह औरतों पर उपकार कर रहे हैं। श्री की भाभी ने सालों तक अपने पति से, जो भी थोड़ा बहुत मिला, उसे स्वीकार किया। श्री की भतीजी इतनी समझदार तो थी कि उसने श्री को यह एहसास दिलाया कि उसे मधु को नहीं छोड़ना चाहिए, लेकिन उसमें भी इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह उसे खुलकर सेक्सिस्ट (लिंग के आधार पर भेद-भाव करने वाला व्यक्ति) बुला सके। नमित को लगा कि वह जब चाहे मधु की जिंदगी में वापस आ जाएगा, माफ़ी मांगेगा, और वह उसे फिर से अपना लेगी। और सबसे अनुचित बात? वह सचमुच ऐसा करने की सोचने लगती है। श्री का दोस्त भी उसका ही साथ देता है। शायद इसलिए क्योंकि उसकी भी यही सोच है। श्री के आस-पास के पुरुषों में कोई अच्छा रोल मॉडल नहीं है जिससे वह कुछ सीख ले सके और महिलाओं को भी आवाज़ ना उठाने और चुपचाप इस पितृसत्ता (पैट्रिआर्की) को स्वीकार करते दिखाया है। अंत में, जब मधु श्री को स्वीकार करती है, तो वह भी इस सामाजिक अपेक्षा के तहत झुक जाती है कि महिलाओं को क्षमाशील होना चाहिए। और हालांकि वास्तविक जीवन का कड़वा सच यही है, लेकिन अगर हम इन काल्पनिक फिल्मों, नाटकों और साहित्य में भी कोई विकल्प दिखाने को तैयार नहीं हैं, तो हम बदलाव की उम्मीद नहीं कर सकते।
तो नहीं, मुझे नहीं लगता कि मधु को रुकना चाहिए था। मुझे नहीं लगता कि उसे समझौता करना चाहिए था। मुझे लगता है कि वो इससे बेहतर की हकदार थी।
मैंने काफी समय से कोई रोमांटिक फ़िल्म नहीं देखी थी, और इस फ़िल्म को देखने के बाद, पता चला, मेरी इच्छा अभी भी अधूरी रह गई।
