सेक्स एजुकेशन देने में माता पिता की पहली गलती: पी-पी, नूनूस और परिवार का गहना
सेक्स एजुकेशन घर से प्रारंभ होती है
हैरानी भरी बड़ी-बड़ी आँखों के साथ, मिसेज़ शर्मा ने बड़बड़ाते हुए मुझे टोका, “मुझे तो यकीन ही नहीं हो रहा कि तुमने अभी-अभी अपनी बेटी को यूरिन करने के बाद ‘वजाइना’ धोने को कहा। तुम यह ‘वी’ शब्द बोल भी कैसे सकती हो? हे भगवान, वह अभी सिर्फ पांच साल की है।”
मैंने उतनी ही हैरानी के साथ उन्हें देखते हुये कहा, “तो क्या मुझे ऐसे दिखावा करना चाहिये जैसे कि यह भाग हमारे शरीर का हिस्सा ही नहीं है?”
मुझे नाटकीय होने के लिए, डांटते हुए उनका भाषण चलता रहा, “तुम उसे अपनी ‘वी-वी’ या ‘पी-पी’ धोने के लिए भी कह सकती थी। तुम जैसे नये ज़माने के माता-पिता हर चीज़ को बहुत ज़्यादा ही खींच देते हो।”
फिर क्या था, मेरा शिकार मेरे सामने था, मुझसे भी रहा नहीं गया।
“ओह, शर्मा आंटी, आपकी सी-सी के नीचे तो बहुत काले घेरे बन गये हैं।”
“हैं? यह सी-सी क्या है?”
“आपकी आंखें, और क्या? एक बात कहूं, आपकी स्मैलू कितनी क्यूट है।”
“स्मैलू?”
“आपकी नाक, आंटी।”
“तुम्हें क्या हो गया है? आंखों को ‘सी-सी’ और नाक को ‘स्मैलू’ कह रही हो। आज क्या सुबह-सुबह ही तुमने कॉफी की जगह पटियाला पैग मार लिया है?”
मेरी बातें सुनकर वह चकरा गईं, और मैं मुस्कुराकर वहां से निकल गई।
बढ़ती उम्र में, हम में से अधिकांश लोगों को ना तो सेक्स एजुकेशन दी जाती थी, और ना ही जेनिटल्स (गुप्तांग) का जिक्र करने के लिए सही शब्द सिखाया जाता था। हमारे प्राइवेट पार्ट्स, या तो बिल्कुल नज़रअंदाज़ किये जाते थे, या फिर उन्हें अजीब से नाम दिये जाते थे जैसे, “यह तुम्हारी नूनू, लुली, विल्ली, फूद्दी, सोनी, सूसू करने की जगह है”…और ना जाने क्या-क्या।
दुर्भाग्य यह है, कि यह परम्परा हमारे स्वयं माता-पिता बनने के बाद भी चली जा रही है। बस फर्क सिर्फ इतना है, कि अब ये नाम थोड़े क्रिएटिव हो गये हैं। एक छोटे बच्चे ने मुझे बताया, कि उसकी मां उसके पेनिस को ‘एफिल टॉवर’ कहकर बुलाती हैं। तो दूसरे की मां ने अपने बेटे को बताया, कि उसके जेनिटल्स उनके परिवार का गहना हैं।

कल्पना करो, कि यही बच्चे बड़े होने पर डॉक्टर के पास जाकर कहें, “डॉक्टर, डॉक्टर, मेरे परिवार का गहना सिकुड़ता जा रहा है।” या “मेरा एफिल टॉवर, लीनिंग टॉवर ऑफ पीसा की तरह टेढ़ा हो गया है।”
बच्चों को सही शब्द न सिखाकर, हम खुद उनके लिये गलत भाषा बोलने के दरवाज़े खोल रहे हैं। जब बचपन में ही उन्हें पेनिस को ‘पी-पी’ या वल्वा को ‘वी-वी’ कहने से नहीं रोका जाता, बल्कि यही सिखाया जाता है, तो बड़े होने पर इस भाषा का उपयोग करना, उन्हें सबसे आसान और कूल विकल्प लगता है। पेनिस ‘डिक’ और वल्वा ‘पूसी’ में बदल जाता है। पर अब उनके ऐसी भाषा के उपयोग करने पर नाराजगी जताने से पहले, यह याद करें की इसकी शुरुआत कैसे और किसने की थी?
कैसी विडंबना है, जो बच्चे सही शब्द का प्रयोग करते हैं – उन्हें ‘भ्रष्ट’ कहा जाता है, और जो गलत शब्दों का प्रयोग करते हैं – उन्हें ‘क्यूट’ माना जाता है। मैं समझती हूं, कि हममें से कई लोगों को बढ़ती उम्र में सेक्स एजुकेशन नहीं मिली, तो अब व्यवहार में बदलाव लाना शुरू में असहज लगेगा। यदि आप बच्चों को पुरूष या महिला के जेनिटल्स के विशिष्ट नाम सिखाने में असहज हो, या फिर आप को मिसेज़ शर्मा जैसे लोगों की चिंता है, तो कम से कम उन्हें जेनिटल्स कहना तो सिखाइये। फिर जब वह थोड़े बड़े हो जाएं, तो आप उन्हें पुरूष व महिला के जेनिटल्स के बीच का अंतर सही शब्दावली के साथ समझा सकते हैं।
जब शेक्सपियर ने कहा था, “नाम में क्या रखा है?” तब मुझे यकीन है कि, यह उनकी उम्मीद से परे होगा, कि भारतीय माता-पिता इस बात को इतनी गंभीरता से ले लेंगे।
अंजू किश सेक्स एजुकेशन के क्षेत्र में एक पायोनीर हैं, और UnTaboo नामक संस्था की फाउंडर हैं।

