एक शहरी जर्माफोब की कम्पोस्टिंग गाइड
थोड़ी-सी फंगस से घबराने की ज़रूरत नहीं है!
अभी हाल ही में, मुझे ट्वीक इंडिया एडिटर से एक अजीबोगरीब स्टोरी आईडिया ‘चमचमाते कपड़ों की शौक़ीन एक जर्माफोब ने कम्पोस्ट बनाना सीखा’ पर काम करने का सुझाव मिला। सच कहूँ तो, गिने-चुने 6 चिप्स वाला पैकेट भी ख़त्म हो जाने पर इतनी जल्दी नहीं लटकता होगा, जितनी स्पीड से, मेरा मुँह लटक गया। बस तभी से मुझे रामसे ब्रदर्स की फिल्मों के डरावने सीन याद आ रहें हैं: सरसराते कीड़े-मकौड़े, सड़ता दलदल और इतनी भयानक बदबू की पड़ोसियों को पुलिस बुलाने की नौबत आ जाए। मरती क्या न करती, इससे बचने के लिए मैंने गूगल करना शुरू किया – अनगिनत पॉट्स, बिन्स और कंटेनर्स और न जाने क्या-क्या, यहाँ तक की अपने हर उस जानकार का दिमाग खा गई, जिसने शायद कभी कम्पोस्ट का ‘क’ भी पढ़ा हो। और ज़ाहिर है, इस दौरान मैं एडिटर के मैसेजेस और कॉल्स के जवाब देने से बचने लगी।
…पर केवल तब तक, जब तक कि मुझे एक पर्फ़ेक्ट बिन नहीं मिल गया।
भारत की बेहतरीन होम कम्पोस्टिंग कंपनी, द डेली डम्प, ने चॉम्प नामक एक ऐसा प्लास्टिक बिन बनाया है, जिसमें नमी और हवा के बहाव को संतुलित रखने के लिए कई छेद दिए हुए हैं और अतिरिक्त पानी को निकालने के लिए एक नल लगा है। मार्केट में उपलब्ध टेराकोटा (इस पॉट पर थोड़े समय में फ़ंगस और चिपचिपा सफ़ेद पदार्थ उग जाता है – बिलकुल न लें) से लेकर मल्टी-लेवल बिन्स (जिसमें असेंबली में इतने करतब करने पड़ेंगे कि रैम्बो सर्कस में काम मिल जाए) पर मेरी पोस्ट-डॉक्टरल थीसिस कर लेने के बाद, मैं दावे के साथ कह सकती हूँ कि छोटे शहरी बरामदों के लिए एक चॉम्प ही बहुत है।
पहला सप्ताह

चॉम्प एक बड़े से बॉक्स में एक मेटल स्टैंड के साथ आया, जो इसे कीड़ों और बारिश के पानी से बचाता है। साथ ही, लगभग तीन किलो रीमिक्स पाउडर, कोकोपीट कम्पोस्टिंग ऐक्सेलरेटर और एक जोड़ी ग्लव्स भी मिले। इसकी सुन्दरता बढ़ाने के लिए कुछ स्टिकर भी साथ आए, जिन्हे मेरी माँ ने बेझिझक गिफ़्ट रैप के काम में ले लिया। बस फिर क्या था, मैंने सेट-अप इंस्ट्रक्शंस की मदद से सबसे नीचे रीमिक्स पाउडर की एक लेयर बिछाई, और फिर लंच की तैयारी से मिले टमाटर, पत्तागोभी, आलू और खीरे के छिलके इसके ऊपर डाल दिए। यह तय था कि हम इस प्रयोग में सिर्फ किचन से मिला बिना पका, प्लांट-बेस्ड सूखा कचरा ही इस्तेमाल करेंगे, चायपत्ती और बचे हुए खाने का नहीं।
यह वर्मिकल्चर नहीं है, इसमें केंचुओं का कोई नामोनिशान नहीं है। यह एरोबिक कम्पोस्टिंग है, जहां ऑर्गैनिक कचरा ऑक्सीजन पर पलने वाले माइक्रोऑर्गैनिज़्म्स की मदद से डीकम्पोज़ होगा, और शुक्र है, कुछ भी दिखाई नहीं देगा।
दूसरा सप्ताह

एक कम्पोस्ट बिन जिस पर नज़र रखी जा रही हो, कभी कम्पोस्ट नहीं होता। मैं नींबू, केले और ना जाने कौन-कौन से छिलकों को हिला-हिला कर थक गई पर ऐसा लग रहा था जैसे कुछ हो ही नहीं रहा। द डेली डंप से मिली सलाह के अनुसार “छिलकों का ढेर नम रहना चाहिए, नाकि गीला”। इसलिए मैंने भी दो दिन उसमें खूब पानी डाला, और शायद डालती रहती यदि मेरी फ्रेंड मुझे उसके कम्पोस्ट बिन की फोटो नहीं भेजती: चमकीले, गुलाबी बीटल्स, जो किसी केंचुए से कम नहीं, ने तो वहां पूरा शहर ही बसा लिया था। मैंने फटाफट नीम की गोलियां आर्डर की, शुरू में दो टेबलस्पून और फिर हर सप्ताह एक टेबलस्पून इसमें मिलाना शुरू किया ताकि फ्रूट-फ्लाइज़ और दूसरे कीड़े इससे दूर ही रहें।
तीसरा सप्ताह

और फिर आई फ़ंगस। मैं कुछ दिन इस बिन को हवा दिखाना क्या भूल गई, यहाँ तो पूरे कचरे और कोको पीट पर चमकते जाले दिखने लगे थे। एक बार फिर जैसे घबराहट का दौरा पड़ गया, कई फ़ोन किए, और फिर पता लगा कि यह तो एक अच्छा साइन है और अब इसे अच्छी तरह हवा दिखानी चाहिए। यदि आप कुछ दिन इस पर ध्यान ना दे सकते हों तो आप इन छिलकों पर रीमिक्स पाउडर की लेयर ज़रूर डाल दें, वरना फ्रूट फ़्लाइज़ की पार्टी का हिस्सा बनने के लिए तैयार रहें।
चौथा सप्ताह

बिन की मिट्टी अब चाय के पाउडर जैसी दिखने लगी थी, नींबू और केले के छिलकों के टुकड़े गलकर धीरे-धीरे मिट्टी में मिलने लगे। शुरुआत किए हुए, एक महीना ही हुआ था, कि इसकी मिट्टी का रंग अब गहरा हो गया था और केवल प्याज़ के पतले छिलके और कुछ तेजपत्तों के अलावा बिन में कोई भी चीज़ ऐसी नहीं बची थी, जिसे पहचाना जा सके।
यह मेरे लिए एक अनोखी ख़ुशी से भरा पल था, ऐसा पल जिसे बहुत ही कम लोगों के साथ बांटा जा सकता था। जीवन की इन छोटी-छोटी जीतों से मिलने वाली ख़ुशियों का जश्न तो इसे समझ सकने वाले लोगों के साथ ही मनाया जा सकता है। है ना? मैंने तुरंत ही बिल्डिंग के माली को बुलाकर, बालकनी के सभी गमलों में अपने हाथों से तैयार की गयी खाद डलवाई, वह भी मेरी इस सफलता से बहुत प्रभावित लग रहा था।
पिछले दो महीनों में, मैंने अपने कम्पोस्टिंग के अनुभव से यह सीखा:
1. जब तक आप खुद कम्पोस्टिंग करना शुरू नहीं करते, आपको अंदाज़ा ही नहीं होता कि आपकी किचन से रोज़ कितना कचरा निकलता है: मैं हर खाने के बाद फल और सब्ज़ियों के छिलके बिन में डालती जाती थी। इतना कचरा जमा होता कि करीब एक किलो से भी ज़्यादा कचरे का एक पहाड़ सा बन जाता। तब जाकर इस सच्चाई का अहसास होता है कि इस्तेमाल करने योग्य यह ऑर्गैनिक कचरा बेवजह कचरे के ढेर में सड़ता रहता है।
2. कम्पोस्टिंग आज के समय में एक प्राकृतिक चमत्कार है: देखा जाए तो, आपको कीड़ों, मक्खियों, लार्वा और बैक्टीरियाज़ की ज़रूरत है। यह डाइजेशन में मदद करते हैं। ज़्यादातर, कम्पोस्टिंग में 30 से 45 दिनों का समय लगता है, लेकिन यदि आपका कचरा अच्छी तरह कम्पोस्ट में तब्दील नहीं हो रहा है तो आप यहां से सेल्युलोलाइटिक और लिग्नोलाइटिक माइक्रोब्स ख़रीद सकते हैं।
3. दोस्तों से मिली छोटी-सी मदद भी बहुत काम आती है: डेली डंप, जिन्होंने फोटोज़ भेज कर, हर स्टेज पर मेरे कम्पोस्ट को समझने में मेरी मदद की, पर साथ ही कुछ कम्पोस्टर्स से भी जान-पहचान बनाना अच्छा रहता है, ताकि कीड़ों को देखते ही आपके घबरा जाने पर, वे आपको शांत करा सकें।
4.जितना छोटा उतना बेहतर: मैंने थोड़ा आलस किया और केले के बड़े-बड़े छिलके सीधे ही बिन में डाल दिए। लेकिन इस कचरे को छोटा-छोटा काट कर डालने से आपको इसके परिणाम जल्दी और बेहतर मिलेंगे।
5.यह एक कीड़े-मकौड़ों से भरा जीवन है: कम्पोस्टिंग बहुत घिनौना भी हो सकता है। इसका एक पहलू – बदबू, फ्रूट फ़्लाइज़ और हमेशा आसपास रेंगते कीड़े-मकौड़े भी हैं। लेकिन यह जीवन-चक्र का एक अच्छा उदाहरण है – हर चीज़ अंतत: मिट्टी में ही मिल जाती है, और दोबारा नए जीवन की शुरुआत होती है। इस बात को महसूस करने का भला कम्पोस्टिंग से बेहतर कोई और तरीक़ा हो सकता है? और हां, सबसे ज़रूरी बात – आप अपने फेवरेट चमचमाते कपड़े पहनकर भी कम्पोस्ट बिन में बेहिचक खोदा-खादी कर सकती हैं!
नीति मेहरा एक सस्टेनेबिलिटी एक्सपर्ट और बीजलिविंग की फाउंडर हैं, जो भारत में स्लो लिविंग कन्सेप्ट पर जानकारी देता एक जर्नल है।

