अलंकृता श्रीवास्तव ने काफी वर्जिन ब्राइड्स और बलिदानी माँ देखी हैं
भारतीय फेमिनिस्ट फिल्म-निर्माण में पोस्टर गर्ल की तरह उभरते हुए, यह पूर्व “तानाशाह” भारतीय सिनेमा द्वारा औरतों की छवि के चित्रण को एक नया रूप दे रहीं हैं
“केवल इसलिए कि मैं तुम्हारे साथ सोई हूं, इसका मतलब ये नहीं है कि मैं तुमसे शादी करूंगी।” फ़िल्म टर्निंग थर्टी के टीवी प्रोमो में लापरवाही से कहा गया यह संवाद, उनके शुरुआती निर्देशन का है, जिसने अलंकृता श्रीवास्तव और भारतीय संस्कारों को बचाने में मुस्तैद सेंसर बोर्ड को आमने-सामने ला खड़ा किया।
सेंसर बोर्ड हैरान था; श्रीवास्तव, चुप। “सेंसर बोर्ड की, महिलाओं को लेकर एक तयशुदा सोच है: वर्जिन ब्राइड्स, वफ़ादार पत्नियां और बलिदानी मांएं,” वो कहती हैं, “मैं नैतिकतावादी नहीं हूं और मुझे नहीं लगता कि महिलाओं को किसी फ्रेम में बांधा जा सकता है। इसलिए मैं अपनी कहानियां कहने के लिए लड़ती रहूंगी।”
दुर्भाग्य से उनके लिए, ये लड़ाई उम्मीद से पहले ही सामने आ गई। सेंसर बोर्ड के साथ, जब उनका दोबारा सामना हुआ तो इसके नतीजे में उनकी आलोचकों द्वारा सराही गई फ़िल्म लिपस्टिक अंडर माइ बुर्खा बैन हो गई, जिससे ‘हॉल ऑफ़ शेम’ में उनकी जगह और पक्की हो गई। इस फ़िल्म में, छोटे शहर की चार दमित महिलाएं अपनी सेक्शुऐलिटी को जीना चाहती हैं।
सेंसर बोर्ड को अंदेशा नहीं था, कि भारतीय दर्शक मुख्य धारा के सिनेमा में अलग-अलग तरह के लेस्बियन सेक्स सीन देखने के लिए तैयार हैं। ‘अपनी ओर’ से 16 कट्स लगाने और छह महीने के कोर्टरूम ड्रामा के बाद आख़िरकार यह फ़िल्म सिनेमाघरों तक पहुंची। फ़िल्म द्वारा 20 करोड़ का मुनाफ़ा कमाना, साबित करता है कि ये क़ानून बनाने वाले कितने ग़लत थे।

श्रीवास्तव को इस बात का अंदेशा था, कि पाखंड के लिए कुख्यात सेंसर बोर्ड, महिलाओं के अनौपचारिक सेक्स या सहमति से सेक्स के आइडिया पर तो बेहोश ही हो जाएगा। लेकिन उनके कुछ पुरुष दोस्तों की प्रतिक्रिया ने उन्हें ज़्यादा आश्चर्य में डाल दिया। उनमें से एक ने कहा, “तुम जिस तरह से इसे दिखा रही हो, भारतीय लोग इसके बाद सेक्स ही नहीं करना चाहेंगे।”
जब भी महिलाएं अपनी सेक्शुअल इच्छाओं की खोज की कहानी कहती हैं, समाज हमेशा असहज हो जाता है। हां, केवल पोर्न साइट्स को छोड़कर। अपनी छोटी कहानी लिहाफ़ में लेखिका इस्मत चुगताई ने पारंपरिक शादी के बाहर का लेस्बियन रिश्ता दिखाया था; वर्ष 1942 में उन पर इसके लिए अश्लीलता का मुक़दमा चला था। दशकों बाद, जब वर्ष 1996 में, दीपा मेहता ने शबाना आज़मी और नंदिता दास को लेकर इस कहानी को पर्दे पर साकार किया, तो उन्हें हिंसक प्रदर्शनों का सामना करना पड़ा था।
अलंकृता श्रीवास्तव, कड़वा सच
बीस साल बाद, लगता नहीं की कुछ ख़ास बदला है। लेकिन अलंकृता श्रीवास्तव आज भी भारतीय फेमिनिस्ट फिल्म निर्माण की पोस्टर गर्ल का परचम उठाएं बहुत खुश हैं। “कोई भी सच्चाई देखना नहीं चाहता है। ये सब बहुत व्यवस्थित है-सेक्सिज़म और असमानता,” वो कहती हैं। “हालांकि मैं वो कर रही हूं जो मुझे पसंद है, पर जब मैंने पहले-पहल इंडस्ट्री में क़दम रखा था मैं हैरान रह गई थी।”

काम के शुरुआती दौर में, वर्कप्लेस पर सेक्सिज़म ने उन्हें जैसे कुछ कहने के लायक़ ही नहीं छोड़ा था। उन्हें याद है, केवल तीन महिलाओं का, 250 पुरुषों के बीच काम करना। महिलाओं की संख्या निराशाजनक थी। जब उन्होंने अपने काम की शुरुआत की, तो प्रोडक्शन उन्हें जानबूझ कर ग़लत उपकरण देता था। उन्होंने करियर के दौरान बहुत ही जल्दी अपनी बात को रखना सीख लिया था। लेकिन प्रकाश झा की फ़िल्म राजनीति में बतौर एग़्जेक्यूटिव प्रोड्यूसर काम करते हुए, उनके ग़ुस्से का पारा सातवें आसमान तक पहुंच गया था। “पूरा भोपाल जैसे मुझसे नफ़रत करने लगा। मै तानशाह हो गई थी,” वो बताती हैं। “मैंने बहुत मेहनत की, लेकिन पूरे समय चीखते-चिल्लाते, मैंने अपनी आवाज़ लगभग खो ही दी थी। यह पावर दिखाने का एक तरीका है।”
शुक्र है उन महिलाओं का जो अपनी बात सुनाने के लिए आवाज़ ऊंची करने से नहीं डरतीं, समानता की ओर ले जानेवाली लंबी यात्रा शुरू हो चुकी है। अब इंडस्ट्री में शुरुआत करने वालों को किसी भी सेट पर केवल तीन महिलाएं नहीं मिलतीं। स्ट्रीमिंग प्लैटफ़ॉर्म्स ने अब लेखिकाओं, महिला कहानीकारों को अपना काम दिखाने के कई अवसर उपलब्ध कराए हैं। स्टूडियोज़ उन्हें प्रेरित करने लगे हैं, डिस्ट्रीब्यूटर्स उनका स्वागत करने लगे हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि महिला क़िरदारों की प्रमुखता वाली फ़िल्में, जैसे डेल्ही क्राइम , तुम्हारी सुलु और बधाई हो अब मुख्य धारा के सिनेमा का हिस्सा हैं।

श्रीवास्तव ख़ुद भी सम्मानित शो मेड इन हैवन की सह-लेखिका रह चुकीं हैं, जिसे ज़ोया अख़्तर ने प्रोड्यूस किया था और फ़िलहाल अपनी नेटफ़्लिक्स ओरिजनल सीरीज़, बॉम्बे बेगम्स पर काम कर रही हैं।
समीक्षकों द्वारा सराही गई हर फ़िल्म या टीवी शो के लिए, श्रीवास्तव हमें मुँह बंद करके वीरे दी वेडिंग और फ़ोर मोर शॉट्स प्लीज़ जैसे ड्रामा को हज़म करने की सलाह देती हैं। “पुरुष हमेशा से ही हर तरह का कचरा बनाते रहे हैं। उन्हें कोई कुछ नहीं कहता। पहले आप प्लेग्राउंड को सबके लिए एक समान बनाइए, तब कहीं जा कर आपको कॉन्टेन्ट की क्वालिटी के बारे में चर्चा करने का हक़ हासिल होगा।”

