"उन्हें यह नहीं दिखता कि एक गंजी दुल्हन बनने के लिए कितना साहस चाहिए"
27 वर्षीय महिमा घई ने सुंदरता के पारंपरिक मानदंडों को चुनौती दी
अपनी शादी वाले दिन, मैं अपने भारी ब्राइडल लहंगे में, शानदार गहनों और मेकअप के साथ, बिना बालों के पूरी तरह से सजी-धजी स्टेज पर खड़ी थी।
कई मेहमानों और परिवार वालों ने कहा, “सब कुछ बहुत सुंदर था। लेकिन कम से कम शादी के लिए तो अपना गंजापन छुपाने के लिए एक विग का इंतज़ाम कर सकती थीं।” जब मेरी शादी की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल होने लगीं, तो कई लोगों ने मेरी हिम्मत की सराहना की, लेकिन कुछ आलोचनाएं बेहद खराब थीं। लोगों ने कहा कि महिलाएं अपने पति की मृत्यु के बाद सिर मुंडवाती हैं, तो कुछ ने कहा कि मुझे विग पहनना चाहिए था।
उन्हें यह नहीं दिखा कि एक गंजी दुल्हन के रूप में स्टेज पर सबके सामने खड़े होने और शादी की सारी रस्मों में इस रूप में शामिल होने के लिए कितनी हिम्मत चाहिए होती है। लेकिन यह पल, जब मैं अपना सिर उठा के सबके सामने खड़ी थी, 27 साल के संघर्ष और दर्द की पराकाष्ठा थी।
इसकी शुरुआत कैसे हुई
जब मैं लगभग दो साल की थी, हमें पता चला कि मैं एलोपेसिया नामक एक लाइलाज ऑटोइम्यून बीमारी से ग्रसित हूं। बचपन से ही, यह बात मेरे माता-पिता के लिए चिंता का विषय रही है। लड़कों में गंजापन भले ही नज़रअंदाज़ कर दिया जाता हो, लेकिन लड़कियों को इसके लिए समाज में बहुत कठोर आलोचनाओं का सामना करना पड़ता है।
मेरे माता-पिता मुझे डॉक्टरों के पास ले जाने लगे और हमने कई सालों तक आयुर्वेदिक उपचार भी आज़माए। बाल उगते तो थे, लेकिन मेरा शरीर धीरे-धीरे हर उपचार का आदी हो जाता था, जिससे उपचार बेअसर हो जाता था और गंजापन फिर से लौट आता।
फिर एलोपैथिक इलाज की बारी आई। डॉक्टरों ने हेयर फॉलिकल विकसित करने के लिए प्रयास शुरू किए, जिसका मतलब था कि हर हफ्ते मेरे सिर में 300 इंजेक्शन लगाए जाते थे। यह सिलसिला आठवीं क्लास से ग्यारहवीं क्लास तक चलता रहा। मेरे बाल पूरी तरह से वापस उग आए, लेकिन जैसे ही खुराक कम की गई, वे फिर से झड़ने लगे। इसके दुष्प्रभाव बहुत भयानक थे: मेरा वजन बढ़कर 110 किलो हो गया, पूरे शरीर पर स्ट्रेच मार्क आ गए और मुझे गंभीर हार्मोनल असंतुलन का सामना करना पड़ा।
इसके बाद, हमने होम्योपैथी का सहारा लिया। तब तक, मेरे शरीर ने हर तरह के इलाज को अस्वीकार कर दिया था। मेरे सिर के केवल आधे हिस्से पर ही बाल थे। परेशान होकर, मैंने बारहवीं क्लास में अपने सिर के बाल मुंडवाना शुरू कर दिया और स्कूल में विग पहनने लगी।
अपनी राह ढूंढना
वह साल मेरे लिए कठिनाइयों से भरा था। यह बढ़ता गंजापन मेरे आत्मविश्वास को भंग करने लगा था और मैं डिप्रेशन में जाने लगी थी, और मैंने किसी को कुछ नहीं बताया, ना मैंने कभी कोई काउंसलिंग ली। मैं खुद से यही पूछती रहती थी, “मेरे साथ ही ऐसा क्यों? बाकी सब तो ठीक हैं।” मेरे परिवार में भी सबके बाल खूबसूरत और घने हैं। हम पंजाबी हैं, और आपको तो पता ही होगा कि ज्यादातर पंजाबियों के बाल कितने शानदार होते हैं।
वो घूरती निगाहें, पीठ पीछे लोगों का हंसना, मज़ाक बनाना, मैं कभी नहीं भूल सकती। यह सब आज भी होता है, लेकिन अब मैंने इन्हें नज़रअंदाज़ करना सीख लिया है। कभी-कभी मुझे गुस्सा आता है और मैं पलटकर चिल्ला देती हूं, क्योंकि यही मेरी रोज़मर्रा की ज़िंदगी है।
इन सब के बावजूद, आर्ट में मैं बहुत अच्छा कर रही थी। पेटिंग और क्राफ्ट वर्क मुझे बेहद पसंद थे। बहुत समझाने-बुझाने के बाद, मेरे परिवार ने मुझे इंदौर में फाइन आर्ट की डिग्री के लिए पढ़ने की अनुमति दी।
यह बदलाव आसान नहीं था, लेकिन पेंटिंग करके मेरे मन को शांति मिलती थी और इस ने मुझे डिप्रेशन से बाहर निकाला।
फिर एक ऐसी घटना घटी जिसने सब कुछ बदल दिया। एक नाटक में अभिनय के दौरान मेरी एक सहपाठी को मुझे फूलों की माला पहनानी थी। गलती से उसने सबके सामने मेरी विग उतार दी।
मैंने तुरंत दुपट्टा उठाया, और वॉशरूम की ओर भागी और वहीं छुपी रही, मुझे डर था कि बाहर निकलकर सबके मज़ाक का सामना करना पड़ेगा। मैं बाहर तभी निकली जब लगभग सब लोग चले गए और फिर हॉस्टल पहुंचकर फूट-फूट कर रोई। मैंने इस बारे में अपने परिवारवालों को भी कभी नहीं बताया। उस दिन मुझे एहसास हुआ कि जो तब हुआ वह भले ही एक दुर्घटना थी, लेकिन भविष्य में कोई भी जानबूझकर कहीं भी, कभी भी ऐसा कर सकता है। मुझे मजबूत बनना पड़ेगा।
अपने पार्टनर से मुलाकात
कुछ समय तक सब कुछ ऐसे ही चलता रहा, फिर मेरी मुलाकात शशांक से हुई। मैं पोर्ट्रेट बनाने का काम करती थी, और उसने एक ऑर्डर दिया, और हमारी बातचीत शुरू हुई। मैंने उसे बताया कि मुझे एलोपेसिया है और यह लाइलाज है।
कुछ समय बाद, हम एक रिलेशनशिप में बंध गए। यह साढ़े आठ साल पहले की बात है।

शशांक से मिलकर मुझे यह एहसास हुआ कि कोई मुझे वैसे ही प्यार कर सकता है जैसी मैं हूं। उसने मुझे मानसिक रूप से विकसित होने में मदद की और कहा कि जब मुझे विग पहनने से इतनी परेशानी होती है तो क्यों पहनती हूं। अपना गंजापन छुपाने के लिए रोज़ाना 10 घंटे विग पहनना किसी यातना से कम नहीं था; उसे सिर पर कसकर बांधने वाली पट्टी से सिरदर्द होता था, बहुत पसीना आता था और बदबू के साथ खुजली भी होती थी। मेरे जो थोड़े-बहुत बाल बचे थे, वे भी खराब हो रहे थे।
इस समय तक मैं सारे इलाज बंद कर चुकी थी। हमने लाखों रुपये खर्च कर दिए थे, फिर भी किसी डॉक्टर ने हमें यह नहीं बताया कि एलोपेसिया लाइलाज है। उस समय फोन या इंटरनेट की ज्यादा सुविधा नहीं थी, इसलिए मैं खुद इस बारे में रिसर्च नहीं कर पाई। इंदौर आने के बाद जब मैंने इसके बारे में गहन रिसर्च की तब सच्चाई का पता चला। मैंने अपना लाइफस्टाइल पूरी तरह से बदल दिया। लगभग दो साल में मेरा वजन 110 किलो से घटकर 78 किलो हो गया। मेरी सेहत में ज़बरदस्त सुधार हुआ, मेरे बाल फिर से उग आए। लेकिन कुछ समय बाद फिर से झड़ने लगे। मुझे बहुत निराशा हुई, खासकर इसलिए क्योंकि उन दो सालों में मैंने एक भी बिस्किट या जंक फूड नहीं खाया था।
इसी दौरान शशांक ने सुझाव दिया कि विग पहनने के बजाय मुझे टोपी पहनना शुरू कर देना चाहिए। उसने कहा कि ये ज़्यादा सुविधाजनक होंगी। मेरे बाल फिर से उग आए थे, लेकिन सिर के ऊपर घने नहीं थे, और टोपी उन्हें छुपा लेगी। आज मेरे पास शायद हज़ारों टोपियां हैं—जो ज्यादातर उसी ने मुझे उपहार में दी हैं।
जब मुझे ट्रेवल करना या बाहर जाना होता था, तो मैं स्कार्फ भी पहनती थी।
जिस दिन मैंने अपने बाल मुंडवाए
जब मास्टर्स की डिग्री के लिए मैं बेंगलुरु गई, तो वहां जाकर मेरी हेल्थ बिगड़ने लगी क्योंकि वहां का फ़ूड कल्चर बिल्कुल अलग था। मेरे बचे-खुचे बाल और तेज़ी से झड़ने लगे। कॉलेज में प्रोफेसर के रूप में काम करते समय भी मैं टोपी पहनती थी, लेकिन बाल इतने ज़्यादा झड़ने लगे कि सिर पर गंजापन नज़र आने लगा था। मैं बहुत चिंतित रहने लगी थी।
मैंने अपने होमटाउन रायपुर लौटने का फैसला किया, ताकि मैं अपने स्वास्थ्य पर ध्यान दे सकूं। मैं अपने बालों को लेकर इतनी परेशान थी कि मुझे लगा मुझे अपना सिर मुंडवा लेने चाहिए। वैसे ही इतने कम बाल बचे थे, बस कुछ छोटे-छोटे पैच रह गए थे जो एलोपेसिया में दिखते हैं। मैं रायपुर पहुंची और अगले ही दिन अपना सिर मुंडवा लिया।
शुरुआत में अजीब लगा, लेकिन फिर मैंने अपना गंजापन स्वीकार कर लिया कि अब मुझे ऐसे ही रहना होगा। मेरी मां को उम्मीद थी कि नियमित रूप से मुंडवाने से बाल फिर से उगेंगे। लेकिन आज तक ऐसा नहीं हुआ है।
शादी तक का सफर
रिश्तेदार पूछने लगे कि मैं अपना गंजापन छुपाने के लिए विग क्यों नहीं पहन रही हूं और वे मुझे विग पहनने के लिए प्रोत्साहित करने लगे। इसी बीच, शशांक और मैंने सगाई करने का फैसला किया, और सबके मन में उठ रहे सवालों का जवाब देने की कोशिश की: मुझसे कौन शादी करेगा? क्या रिश्ते में मुझे धोखा मिलेगा?
फिर भी, परिवार के कई सदस्यों ने मुझे विग पहनने के लिए जोर दिया। लेकिन शशांक के परिवार में किसी ने भी इस बारे में कभी कुछ नहीं कहा।
इस सबके पीछे शशांक का बहुत बड़ा योगदान है, जिन्होंने मुझे मानसिक रूप से विकसित होने में मदद की है। आज मैं जिस आत्मविश्वास के साथ अपनी कहानी शेयर कर पा रही हूं, वह सब शशांक की ही देन है।

मेरे परिवार में, मेरी बहन और मां के अलावा, मुझे किसी और से कोई ख़ास समर्थन नहीं मिला। कभी न कभी, सिर ढकने या विग पहनने का मुद्दा ज़रूर उठता है।
लेकिन अब मैं मानसिक रूप से इतनी मज़बूत हो गई हूं कि जानती हूं कि किसे कब और कैसे जवाब देना है।
दुनिया के लिए मेरा संदेश
मैं प्रार्थना करती हूं कि जो मैंने इन 27 वर्षों में सहा है, किसी और को, कभी भी न सहना पड़े। मैंने अपार कठिनाइयों का सामना करते हुए यहां तक का सफर तय किया है, और अब मैं दृढ़ता के साथ अपनी आगे की जिंदगी सिर उठा कर जीना चाहती हूं और बेझिझक जहां चाहे वहां जाना चाहती हूं। फिर भी, मेरी शादी वाले दिन भी, लोगों ने मुझसे विग पहनने को कहा।
विग पहनने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन इसे पहनने से मेरा व्यक्तित्व पूरी तरह बदल जाता है, और मुझे हमेशा इस बात की चिंता बनी रहती है कि कहीं यह गिर न जाए। उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण बात, वो मैं नहीं हूं।
एक गंजी दुल्हन के रूप में वहां खड़े होना दुनिया के लिए मेरा संदेश था: मैं जैसी हूं वैसी ही काफी हूं।
और मैं यह बात पूरे यकीन से कह सकती हूं: अगर भगवान भी मुझे मेरे बाल वापस देने की पेशकश करें, तो भी मुझे वो नहीं चाहिए। मैं बिना बालों के भी खूबसूरत दिखती हूं, और मेरा यही गंजापन मुझे दूसरों से अलग बनाता है।

