दुर्गा पूजा में पंडाल-होप्पिंग कर-कर के, अगर जान बचे तो लाखों पाएं
नए दर्शनार्थी, उलुलुलुलु करना और सुबह पांच बजे या और तड़के उठना सीख लें
यदि आप यह नहीं समझ पा रहे हैं कि अचानक आपके बंगाली पड़ोसी या सहकर्मी की आवाज़ तीखी क्यों हो गयी है, तो मैं आपको इसका राज़ दो शब्दों में बताती हूं: दुर्गा पूजा (दुर्गा पूजो)। पूजो हो तो कोई बंगाली शांत नहीं रह सकता। वह शायद रवीन्द्र संगीत, टस्सर पंजाबी कुर्ता और पुरानी यादों के ओवरडोज़ से ग्रस्त होगा। बहुत समय से सर्विसिंग मांग रही कार पर ध्यान देने से कहीं ज़्यादा, इस समय उस पर अपनी वॉर्डरोब को नए कपड़ों से भर देने का दबाव होगा।
सालभर बड़े ध्यान से ख़र्च करने वाले यह भद्रलोक अपनी सालभर की 80 फ़ीसदी बचत पूजो की ख़रीदारी और तैयारी पर न्यौछावर कर देते हैं। पिछले महीने से, उनकी पत्नी और बच्चे सीजन के सबसे अच्छे हैंडलूम की तलाश में कोलकाता के गरियाहाट और एस्प्लेनेड के आसपास घूम रहे हैं। मेरा कज़िन जो जर्मनी में पढ़ता है, उसने पूजा पर घर आने के लिए अपनी स्टूडेंट जॉब से हुई सारी कमाई आने-जाने के टिकट ख़रीदने में ही उड़ा दी।
लेकिन कोई भी ख़रीदारी तब तक पूरी नहीं होती, जब तक हम श्रीलेदर्स या ख़ादिम से आरामदेह जूते न ख़रीद लें। ये बहुत ज़रूरी है क्योंकि हम, आलसी जीव, अपना सालाना वर्कआउट दुर्गा पूजा के इन पांच दिनों में ही पूरा करते हैं। और हम इसे पंडाल-होप्पिंग का नाम देते हैं (इसका उच्चारण पैन-डेल कीजिए)। और जब केवल 120 घंटों में आपको 2,000 से ज़्यादा पंडालों के दर्शन करने हों, तो आपको पी टी ऊषा से भी तेज़ दौड़ना पड़ता है, और निश्चिंत रहें, आप फिर भी विफल होंगे। और बेहतर तरीके से समझाने के लिए बता दूं: मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने अपनी पंडाल यात्रा 28 सितंबर से ही शुरू कर दी थी।
आपके पास पंडाल-होप्पिंग का एक फुलप्रूफ प्लान अवश्य होना चाहिए, ताकि आप हीटस्ट्रोक (मजाक नहीं है, कोलकाता में अक्टूबर की गर्मी बहुत घातक है) से बच सकें, भीड़ में खो जाने पर कम से कम दशहरे के पहले तो वापस घर लौट सकें। और सबसे ज़रूरी बात, बहस करने वाले अंकलों और उलुलुलुलु करने वाली आंटियों से दूरी बनाए रखें। पंडाल-होप्पिंग के इस खेल में महारत हासिल करने का एक ही तरीक़ा है कि आप पंडाल-शिष्टाचार सीख लें। नए दर्शनार्थी, यह जान लें कि यदि आपको पूजा की जगह पर मांस के मौजूद होने से परहेज़ है, तो दूर रहें।

सुबह जल्दी उठने वालों को अच्छे से दर्शन होते हैं
सूरज पूरब में उगता है, और अनुभवी पंडाल-दर्शनार्थी जानते हैं कि यह कोलकाता की अपेक्षाकृत ख़ाली सड़कों में घूमने का सबसे अच्छा समय है। जल्दी शुरू करें – सुबह पांच बजे से या और तड़के। जब रात्रि जागरण करने वाले उल्लू अपनी नींद पूरी कर रहे होंगे, तब आप 10 बजे से पहले-पहले ही पंडाल-होप्पिंग का पूरा आनंद उठा लें। यदि आप पहले ही तय कर लें कि कौन-सा रास्ता लेना है, तो पांच घंटे में दस पंडालों के दर्शन किए जा सकते हैं।
अपनी कार से तो भूल ही जाइए
उबर और ओला तो बिलकुल छोड़ ही दें, किराए की कारें या चार पहिया वाहनों से हर कीमत पर बचें। हां, यदि आप पंडाल-होप्पिंग में देवी की आरती सुनने से ज़्यादा सड़क पर चल रही गाड़ियों के हॉर्न सुनना चाहते हैं, तो बात अलग है! पंडाल-होप्पिंग के लिए कोलकाता मेट्रो सबसे अच्छी रहेगी। हालांकि, मुझे संदेह है कि मेट्रो यात्रा के बाद आपके माथे पर लगी बड़ी, लाल बिंदी आपके चेहरे पर टिकी रहेगी। हमेशा अतिरिक्त बिंदियों से लैस रहें। मेट्रो स्टेशनों के आसपास के पंडालों के नक़्शे के साथ, खुद को 10,000 कदम तक की यात्रा के लिए तैयार कर लें।
काम की सलाह: शोवाबाज़ार सुतनुति (स्टेशन) तक मेट्रो लें और आपको एक किलोमीटर की परिधि में दो नामचीन पंडालों के साथ-साथ कुछ छोटे-छोटे पंडालों के भी दर्शन हो जाएंगे। यह बिग बिलियन डे सेल से बेहतर सौदा है।
आपके और धधकती धुनुची के बीच की दूरी का ध्यान रखें:
फ़िल्म परिणीता में सैफ़ अली ख़ान और संजय दत्त का डांस याद है? हां, वही जिसमें मिट्टी के बर्तनों में नारियल के भूसे को जलाकर डांस किया था। यही है बंगाल का जवाब सो यू थिंक यू कैन डास के प्रतियोगियों को, नाकि डोला रे डोला । पंडालों में हर शाम इस डांस का रिवाज़ है। जलता हुआ भूसा कई बार डांस करने वालों के आसपास गिर जाता है, यदि आप असतर्क रहेंगे तो इससे जल भी सकते हैं।
और जब आप यहां हों, तो चिल्लाने वाली आंटियों से अपने कान के पर्दों को बचा कर रखें। बंगाली काकी मांएं और थम्माएं बिना चेतावनी, अचानक ही एक साथ ‘उलुलुलुलु’ की आवाज़ें निकालने लगती हैं।

जरूरत पड़े तो, वीआईपी पास के लिए उस खिझाऊ बंगाली कलीग से भी दोस्ती कर लें:
मैं बात बढ़ा-चढ़ाकर नहीं कह रही हूं, बल्कि चेतावनी दे रही हूं क्योंकि आपको मंडप में प्रवेश के लिए दो घंटों तक खड़ा रहना पड़ सकता है। यह #ट्रूस्टोरी है। और जब आप लाइन में 750 लोगों के पीछे खड़े हों, लाइन तोड़ना उतना ही मुश्क़िल है, जितना कि हाइवे पर एक साफ़-सुथरा शौचालय ढूंढ़ना। हो सकता है आपका कोई दोस्त उस जगह रहता हो, जिसे पंडाल के लिए वीआईपी पास मिला हो। आयोजन समिति के सदस्यों को हमेशा पास मिलते हैं, जो इस वक़्त आपके सभी एयरमाइल्स रिवॉर्ड पॉइंट्स से भी कहीं ज़्यादा काम के साबित होंगे।
खाने में केवल फ़ास्ट-फ़ूड का विकल्प होगा:
जब सड़कें पंडाल दर्शनार्थियों से भरी हों (लाखों की संख्या में), रेस्तरां आपको यही उपलब्ध करवा सकते हैं। आपके पास दो विकल्प होंगे: या तो आप घर लौट जाएं या फिर रेस्तरां के बाहर अपनी बारी आने तक इंतज़ार करें। मैं तो पंडाल में खाना ही पसंद करती हूं – मेरा मतलब है कि जब आप पंडाल में हैं तो क्यों न इसका पूरा लुत्फ़ उठाएं।
अपनी स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए कुछ चीज़ें साथ रख लें, जैसे- पुदीन हरा, जेलुसिल और डाइजीन- क्योंकि पंडाल के खाने में इतना तेल होता है कि कैनेडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो के ऑइल रिज़र्व को भी शर्म आ जाए। हर चीज़ तली हुई होती है। आप जो भी नाम लीजिए, वो उनके पास तला हुआ मिल जाएगा: बैंगन, आलू, कटी हुई सब्ज़ियों के साथ मैश्ड पोटैटो, फ़िश फ़िलेट्स, मटन और चिकन। यह एक पाक-कला सम्बंधित ट्रिप है। साथ ही, यह बहुत ही वाजिब दामों पर मिलता है। सोचिए, 20 रुपए में छह गोलगप्पे! भरोसा नहीं हुआ ना? पर ये सच है।
विशेष टिप्पणी: पुचका में वो इन्ग्रीडिएंट भी हो सकता है, जो कोई राज़ नहीं – इसे बनाने वाले का पसीना।

ना देखना छोड़ सकते हैं, ना छोड़ेंगे – दुर्गा पुजो के यह हॉट स्पॉट:
शोवाबाज़ार राजबाड़ी, कोलकाता:
जब 1757 में इसकी शुरुआत हुई थी, वॉरेन हैस्टिंग्स और लॉर्ड क्लाइव भी इस पंडाल में आए थे। यदि दुर्गा पूजा पंडालों में ब्लू टिक्स की संकल्पना होती तो दो सदियों पुराने इस पंडाल का वैरिफ़िकेशन सबसे पहले होता।
देशोप्रिया पार्क, कोलकाता:
वर्ष 2015 में, प्राचीन पूजा समितियों में से एक पूजा पंडाल ने दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा बनाई थी। यह 80 फ़ीट ऊंची थी। इस पंडाल के दर्शन के लिए रोज़ाना एक लाख से अधिक लोग आते हैं, और इस पंडाल की थीम बहुत अच्छी होती है।
दादर शिवाजी पार्क, मुंबई:
यह मुंबई की पहली दुर्गा पूजाओं में से एक है। यह बॉलिवुड सितारों (मुखर्जी परिवार, बप्पी लाहिरी और गायक अभिजीत) द्वारा आयोजित पूजाओं जैसे सितारों से उतनी भरी हुई नहीं होती है, लेकिन पारंपरिक रिवाज़ों और बंगाली पकवानों का स्वाद चखने की बात हो तो यहां से शुरुआत करना अच्छा रहेगा। यहां आकर लोग एग रोल, पुचका और वेजेटेबल चॉप खाना पसंद करते हैं।
कश्मीरी गेट, दिल्ली:
दिल्ली की यह सबसे पुरानी पूजा, इस बरस 110 वर्ष की हो जाएगी। कश्मीरी गेट पंडाल की पारंपरिक रस्में, दुर्गा पूजा के मौसम में हर दिल्लीवाले की पसंदीदा गतिविधि होती है।
कोरमंगला दुर्गा पूजा, बेंगलुरु:
यह तुलनात्मक रूप से बहुत ही नया पूजा पंडाल है, लेकिन यहां इस त्यौहार को बहुत भव्य तरीक़े से मनाया जाता है। रोज़ शाम की आरती के बाद यहां बॉलिवुड गायकों के प्रदर्शन का लुत्फ़ उठाया जा सकता है।

