क्या आप भी अजीबोगरीब बेमेल डिब्बों के पहाड़ तले दबे हैं? तो एक बार इस इंडियन मैरी कोंडो को आजमाएं
वह आपके घर को म्युज़ियम में नहीं बदलने देंगी
यह कहना सही होगा कि हममें से ज़्यादातर लोग ऐसे परिवारों में पले-बढ़े हैं जहां डिक्लटरिंग का कॉन्सेप्ट ही नहीं था, रेस्टोरेंट के टेकअवे डिब्बे और कैरी-बैग संभाल कर रखना एक बेहद जरूरी काम माना जाता था। हमारे पैरेंट्स “खास मौकों” के लिए कीमती क्रॉकरी बचा कर रखते थे जो कभी आते ही नहीं थे, और प्लास्टिक के बैगों और टपरवेयर के कंटेनरो से भरे हमारे अव्यवस्थित घर ऐसे दिखते थे जैसे किसी आने वाले सर्वनाश से बचने के लिए बंकर तैयार किए जा रहे हों। हममें से कितनों ने यह प्रण लिया होगा कि जब हमारा अपना घर होगा तो वह बिल्कुल साफ़-सुथरा होगा – और यह सब सामान, हमारे म्यूज़िक कैसेटों के विशाल ढेर के साथ, पीछे छूट जाएगा। लेकिन जब हम बड़े हुए, तो पता ही नहीं चला कि जाने-अनजाने कब हमने भी स्विगी/ज़ोमाटो के डिलीवरी बॉक्सों का अपना एक विशाल संग्राहलय बना लिया।
हम हर संभव कोशिश करते हैं, कि हमारा जितना भी बेकार और गैरजरूरी साज़-सामान है उन्हें अलमारियों और दराजों में ठूंस दें, लेकिन वह फिर भी मनी प्लांट की बेल की तरह बढ़ता जाता है, बढ़ता ही जाता है, और बढ़ जाता है और फिर आखिरकार बाहर जगह घेरने लगता है – खिड़कियों की चौखटों से लेकर, खाली कुर्सियों पर, डाइनिंग टेबल पर और बिस्तरों के नीचे तक। अब जब भी हम मैग्नीशियम कैप्सूल की वो आवारा बोतल, कोई पुरानी हार्ड ड्राइव, या पिछले जन्म में खरीदा हुआ शोपीस, बेघर, यूंही लटका हुआ देखते हैं, तो हमारे बचपन का ट्रॉमा लौट आता है और हमारी रूहें कांपने लगती हैं।
और फिर एंट्री होती है, रचना कक्कड़ की, जो भारत में मैरी कोंडो द्वारा सर्टिफाइड कुछ प्रोफेशनल ऑर्गनाइज़रों में से एक हैं, जिन्होंने देश भर में अनगिनत लोगों को अपने अव्यवस्थित घरों की डिक्लटरिंग करके उनकी काया पलटने में मदद की है। हाल ही में, हमने मुंबई स्थित इस एक्सपर्ट को अपने ट्वीक इंडिया ऑफिस में आमंत्रित किया ताकि वे अपनी ऑर्गनाइज़िंग टिप्स हमारे साथ शेयर करें, ऐसा जादू चलाएं कि हमारी कबाड़ से भरी ड्रावर फिर से काम की लगने लगे और हमें सिखाएं कि आखिर 3-किलो के भारी लहंगों जैसे कॉम्प्लेक्स ऑउटफिटों को कैसे तह करके रखना चाहिए। हमारे सेशन के दौरान, हमें यह जानकर ख़ुशी भी हुई और आश्चर्य भी, कि यह डिक्लटरिंग एजेंट कभी हमारी तरह ही थी – कक्कड़ एचआर में कार्यरत थीं, और उनका घर भी उनके क्लाइंट्स की तरह अव्यवस्थित हुआ करता था। वह शॉपिंग की इतनी बड़ी शौकीन थीं, कि शायद ही कभी खाली हाथ घर लौटती थीं।
तो, वह एक लापरवाह इंसान से सफाई कीड़ें में कैसे बदल गईं? यह परिवर्तन तब आया जब कक्कड़ 2018 में लखनऊ अपने पेरेंट्स से मिलने उनके घर गई थीं। उस एक यात्रा ने ही उनके मन में डिक्लटरिंग का यह बीज बोया जो अब उनका मिशन बन चुका है। एक दिन बैठे-बैठे, ऐसे ही उनकी मां शिकायत करने लगीं कि उनके पास सामान रखने की जगह ही नहीं है। हालांकि उनका घर काफी बड़ा, और दो मंज़िला था, जिसमें सिर्फ़ उनके माता-पिता रहते थे। चारों ओर नज़र घुमाई तो कक्कड़ को एहसास हुआ कि उनमें और उनकी मां में काफी समानता है। उनका घर भी पीढ़ियों से जमा की गई अनावश्यक चीज़ों से भरा पड़ा था: कक्कड़ के अपने बचपन के खिलौने, पुराने फूलदान और सजावटी शोपीस जो उनकी मां को उनके माता-पिता ने दिए थे। वाकई में, ऐसे अव्यवस्थित घर में जिसे देखकर ही दिमाग के सारे तंतु हिलने लगें, कोई कैसे और जगह बना सकता था। कक्कड़ बताती हैं, “जब मैंने उनसे पूछा कि आप ये पुरानी बेकार चीज़ें हटा क्यों नहीं देतीं, तो उन्होंने कहा कि उन्हें नहीं लगता कि वे यह अकेले कर पाएंगी। तब मैंने तय किया कि मैं उनकी मदद करूंगी।” अपनी मां के साथ मिलकर घर के सामान को छांटने में उन्हें करीब एक हफ़्ता लगा, और तब जाकर यह तय हो पाया कि क्या रखना है, क्या दान करना है और क्या फेंकना है। हालांकि ऐसा नहीं था कि इसके बाद उनका घर किसी डेकोर मैगज़ीन के घरों जैसा व्यवस्थित लगने लगा था, लेकिन सामान कम होते ही घर में सुकून महसूस होने लगा था। तभी कक्कड़ को एहसास हुआ कि उनकी मां की तरह और भी कितने लोग होंगे, खासकर जो अकेले रहते हैं, और जो एक व्यवस्थित घर की चाह रखते हैं लेकिन उन्हें समझ ही नहीं आता कि वह इसकी शुरुआत कहां से करें। उन्होंने कुछ रिसर्च की और पाया कि कई देशों में ‘प्रोफ़ेशनल ऑर्गनाइज़र’ जैसा एक जॉब होता है, लेकिन भारत में इसे कुछ ख़ास एक्स्प्लोर नहीं किया गया है। उन्हें इसमें एक बहुत अच्छा मौका दिखा और उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध मैरी कोंडो से सर्टिफिकेट लेने का फ़ैसला किया।
अगर आप यह जानना चाहते हैं कि कक्कड़ जैसे प्रोफ़ेशनल ऑर्गनाइज़र कैसे काम करते हैं: आप अपने पूरे घर या ख़ास हिस्से जैसे अलमारियां या पेंट्री, इत्यादि के लिए उनकी सेवाएं ले सकते हैं। आप उन्हें पर्सनल या वर्चुअल रूप से अपने घर का दौरा कराते हैं, और वे आपके सामान की एक लिस्ट बनाते हैं। फिर ये ऑर्गनाइज़र आपको डिक्लटरिंग यानि अनावश्यक और आवश्यक चीजों को छांटने और उन्हें हटाकर आपके घर को व्यवस्थित करने की प्रक्रिया में आपको गाइड करते हैं और सहायता प्रदान करते हैं।
थोड़े से फ़ालतू सामान से क्या फर्क पड़ता है?
कुछ लोगों का मानना है कि घर थोड़ा बिखरा हुआ हो तो ऐसा लगता है जैसे वहां लोग बसते हैं। और हां, कई बार जानबूझकर की गई थोड़ी-सी अव्यवस्था आपके घर को एक अनोखा व्यक्तित्व और आकर्षण दे सकती है। लेकिन सालों पुरानी बिना पढ़ी मैगज़ीन्स का ढेर, पुराने इकलौते बचे हुए अलग-अलग डिज़ाइन वाले मोज़ों का कलेक्शन, किचन काउंटर पर रखा वेजिटेबल चॉपर जो आप कब का भूल चुके हैं? ये सब प्यारे नहीं लगते। और तो और, ये धीरे-धीरे आपकी मानसिक शांति और ऊर्जा को चूस रहे हैं।
कक्कड़ ने हमें बताया, “जब मेरी अलमारी हमेशा बिखरी हुई और अस्त-व्यस्त रहती थी, तो मेरी हर सुबह निराशा के साथ शुरू होती थी। उन कपड़ों के ढेर के सामने खड़े होकर मुझे हर समय ऐसा लगता था जैसे मेरे पास पहनने के लिए कुछ है ही नहीं, क्योंकि उस ढेर में मुझे कभी कुछ मिलता ही नहीं था।” वह अपनी अलमारी को हाथ लगाने से भी डरती थीं और उसे व्यवस्थित करने के लिए वे अपनी मां के आने का इंतज़ार करती थीं। उनकी मां, जिन्होंने खुद अपने घर की डिक्लटरिंग में कक्कड़ की मदद ली थी, वही अब कक्कड़ की अलमारी व्यवस्थित करने की ज़िम्मेदारी संभाल रही थीं। कैसी विडंबना है, लेकिन इससे यह पता चलता है कि इस प्रक्रिया में यदि कोई आपकी मदद करें तो डिक्लटरिंग कितनी आसान हो जाती हैं।
एक अव्यवस्थित घर आपको निरंतर शर्मिंदगी का अहसास कराता है, चारों और बिखेरा देखते रहने से आपको एंग्जायटी महसूस हो सकती है, चीज़ों पर नियंत्रण न रख पाने का तनाव बढ़ने लगता है – घर को व्यवस्थित ना रख पाने का मेन्टल स्ट्रेस भी आपको थका सकता है। दरअसल, इस रिसर्च के अनुसार, जिन महिलाओं के घर अव्यवस्थित पाए गए, उनमें स्ट्रेस हार्मोन कोर्टिसोल का स्तर अधिक पाया गया था। ऐसे समझने की कोशिश करें जैसे कि चिल्लाते हुए बच्चों से भरे कमरे में आप किसी से कोई सार्थक बातचीत करने की कोशिश कर रहें हों – जो आपको दिमागी तौर से पूरी तरह से थका दे और कुछ ख़ास फायदेमंद भी साबित ना हो।
क्लटर इकठ्ठा करने में हमारी संस्कृति का योगदान
मैरी कोंडो का फलसफा एकदम सरल है: अगर कोई चीज़ खुशी नहीं देती या आपके जीवन को आसान नहीं बना रही है, तो उसे छोड़ दीजिए। लेकिन हर भारतीय घर में कम से कम एक सदस्य ऐसा ज़रूर होता है जिसे सामान इकठ्ठा करने का फितूर होता है। उन्हें, हर चीज़ खुशी देती है या फिर उनके अनुसार वह कभी ना कभी काम जरूर आएगी, बस उन्हें यह नहीं पता होता कि वह समय कब आएगा । कक्कड़ को लगता है कि ऐसी परिस्थितियों में उनकी भूमिका काफी काम आती है, और वे KonMari philosophy को भारतीय घरों में लागू करती हैं। उनका मानना है कि हम भारतीय बहुत भावुक लोग होते हैं—और चूंकि बहुत से लोग जॉइंट फैमिली में रहते हैं, इसलिए डिक्लटरिंग एक इकलौते आदमी की बस की बात नहीं होती फिर चाहे वह कितना भी सफाईपसंद और मेहनती हो। जैसे, उनके अनुभव के अनुसार, घर के बड़े बुज़ुर्ग लोगों को उनके जमाने की पुरानी चीज़ों को हटाने के लिए राज़ी करना काफ़ी मुश्किल हो सकता है। इन सांस्कृतिक बारीकियों को संवेदनशीलता और समझदारी से समझना – और सभी की सहमति से एक बीच का रास्ता निकालना – उनकी विशेषता है। KonMari पद्धति में, अलमारी को व्यवस्थित करने के लिए, आपको वेस्टर्न कपड़ों को तह करना और रखना सिखाया जाता है, लेकिन कक्कड़ भारतीय सभ्यता की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए, भारी-भरकम भारतीय पोशाकें, जैसे लहंगे इत्यादि, को भी बेहतर ढंग से व्यवस्थित करने के उपाय सुझाती हैं।
हमने इंस्टाग्राम पर अपने ट्वीक रीडर्स से पूछा कि वे एक प्रोफ़ेशनल ऑर्गनाइज़र से क्या पूछना चाहेंगे। एक महिला ने हमें डीएम किया और सलाह मांगी कि वह अपने पिता को उनके पुराने ऑडियो कैसेट्स के कलेक्शन को हटाने के लिए कैसे मनाएं। इस सवाल के जवाब में कक्कड़ का कहना था: “हम ग्रीटिंग कार्ड या लेटर्स को भावनात्मक चीजों के रूप में देखते हैं, और कैसेट और टेप को काम में आने वाली चीजों की श्रेणी में रखते हैं। लेकिन यह कोई नियम नहीं हैं। अगर उन पुराने कैसेट्स से उन्हें खुशी मिलती है और वह उनके लिए भावनात्मक रूप से महत्वपूर्ण हैं, तो आपके पिता उनमें से कुछ को एक यादगार के तौर पर अपने पास रख सकते हैं। हालांकि, उन्हें किसी बक्से में बंद करके ऊपर टांट पर चढ़ाने के बजाय, शायद आप उनसे कुछ बनाने में उनकी मदद कर सकते हैं।” उन्होंने कैसेट्स का इस्तेमाल करके एक आर्टवर्क या टेबल बनाने का सुझाव दिया ताकि हमारी रीडर एक तीर से दो निशाने साध सकें, उनके पिता के कलेक्शन को घर में एक उपयुक्त जगह मिल जाए और साथ ही साथ क्लटर से भी छुटकारा मिल सकें।
कक्कड़ ने मुंबई में अपनी एक क्लाइंट का एक और किस्सा शेयर किया, जिसे लकड़ी के खूबसूरत बॉक्स इकट्ठा करने की आदत थी, जो वे अपनी शॉपिंग ट्रिप्स या वेकेशन के दौरान अलग-अलग जगहों से चुनकर लाती थी। जब उन्होंने डिक्लटरिंग का काम शुरू किया, इस कलेक्शन से अलग हो पाना उसके लिए बेहद मुश्किल हो रहा था, लेकिन आखिरकार, उसने उनमें से कुछ को हटा दिया। अपनी क्लाइंट के अनोखे जुनून, और हाल ही में हुए तलाक के बाद उसकी आत्म-खोज की ज़रूरत को ध्यान में रखते हुए कक्कड़ ने उसे यह सोचने के लिए प्रोत्साहित किया कि ये बॉक्स उसके लिए क्या मायने रखते हैं। आखिरकार, उसने इनको शॉपिंग एक्सिबिशन में बेचना शुरू कर दिया। कक्कड़ बताती हैं, “जब उन्होंने अपने घर में एकत्रित चीज़ों के बारे में सोचना शुरू किया, तब उन्हें इन बॉक्सों का इस्तेमाल करने की प्रेरणा मिली और इससे कुछ नतीजा अच्छा निकला।”
शुरुआत कैसे करें
पहला कदम हमेशा सबसे कठिन होता है। एक ही हफ्ते में पूरा घर साफ़ करने की कोशिश करने के बजाय, कक्कड़ आपको छोटी शुरुआत करने का सुझाव देती हैं। पहले एक छोटा आइटम हाथ में लें, जो आसानी से साफ़ किया जा सके: एक ड्रावर, एक शेल्फ, या एक ही केटेगरी के कपड़े। उनकी सलाह है, “शुरू करने से पहले, वस्तुओं को तीन अलग-अलग केटेगरी में छांटें: 1) जो रखना है: वे चीजें जिन्हें देखते ही आप ख़ुशी महसूस करते हैं और जो काम भी आती हैं; 2) दान करें/बेचें: वे चीजें जो अच्छी स्थिति में हैं लेकिन अब आपके काम की नहीं हैं; और 3) फेंक दें: टूटी हुई, अनुपयोगी, या एक्सपायर हो चुकी वस्तुओं के लिए।” जैसे ही आपने यह स्टेज पार कर ली, तो आपका डिक्लटरिंग का आधा काम अपनेआप पूरा हो जाएगा।
अगर फिर भी आपको अपनी चीज़ों से जुदा होने में दिक्कत हो रही है, और आप इस दुविधा में हैं कि कभी भविष्य में आपको उनकी ज़रूरत पड़ सकती है, तो कक्कड़ आपको अतीत में वापस जाने की सलाह देतीं हैं। याद करने की कोशिश करें कि आपने आखिरी बार उस चीज़ का इस्तेमाल कब किया था। अगर डेढ़ साल से ज़्यादा हो गया है, तो आपको उसे हटा देना चाहिए। और अगर आगे जाकर आपको उसकी ज़रूरत पड़ती भी है, तो भरोसा रखें कि आप कोई न कोई हल ज़रूर निकाल लेंगे, क्योंकि हम भारतीय जुगाड़ करने में माहिर होते हैं।
जैसे, कक्कड़ ने एक किस्सा सुनाया कि उनके घर में बरसों से धूल खा रहा एक फूलदान निकाल देने के कुछ ही दिनों बाद ही उन्हें तोहफे में फूल मिलें। उन्हें पहले तो बड़ा अफ़सोस हुआ, लेकिन फिर उन्हें एक आईडिया आया। “मुझे याद आया कि मेरे किचन में एक कांच का जग था, तो मैंने उसका इस्तेमाल किया। हम हमेशा अपने आसपास उपलब्ध चीजों में से कोई न कोई विकल्प ढूंढ ही लेते हैं।” डिक्लटरिंग से आपको कम चीज़ें रखने और जो भी आपके पास है उसको विभिन्न कामों में इस्तेमाल करने में भी मदद मिलती है, जो कम खर्च करने का एक अच्छा तरीका भी है। आप एक पुराने मग को पेन होल्डर या मेकअप ब्रश होल्डर के रूप में, या एक पुराने कॉटन कुशन कवर को बैग कवर के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं। एक बार जब आप ध्यान देना शुरू कर देंगे, तो संभावनाएं अनंत हैं।
उनका कहना है कि अपनी वस्तुओं को व्यवस्थित रखने के लिए उन्हें लेबल करें, ऑर्गनाइज़र, बास्केट और ड्रावर डिवाइडरों का उपयोग करें।
अपने घर की सफ़ाई कैसे बनाए रखें
जब आप अपनी इच्छा से डिक्लटरिंग करते हैं, तो अनचाहे सामान में कमी और साफ़-सुथरी जगह देखकर आप निश्चित रूप से खुश और संतुष्ट महसूस करते हैं। लेकिन एक छोटी सी बात ध्यान में रखनी है: आपको समय-समय पर ऐसा करते रहना होगा ताकि सफ़ाई बनी रहें। ऐसा कैसे करें, इसके लिए कक्कड़ यहां कुछ टिप्स दे रहीं हैं (स्पॉइलर: बस एक आदत बनाना जरूरी है):
हर आइटम को एक ‘जगह’ दें: हर चीज़ को एक निश्चित जगह चाहिए होती है। अगर उसे उसकी जगह नहीं मिलेगी, तो वह अवश्य ही इधर उधर लुढ़कती मिलेगी।
‘एक अंदर, एक बाहर’ वाला नियम: जब आप कोई नई चीज़ खरीदें, तो पुरानी, उससे मिलती-जुलती चीज़ हटा दें। नई शर्ट का मतलब है कि पुरानी शर्ट निकलनी चाहिए; नई किताब का मतलब है कि पुरानी किताब जानी चाहिए।
5 मिनट की सफ़ाई: हर रोज़ सोने से पहले, पांच मिनट फटाफट ऊपरी सफ़ाई करने में लगाएं। जो सामान जगह पर नहीं है उन्हें जगह पर रखें, सतहें साफ़ करें और कमरे को व्यवस्थित करें। थोड़ा-थोड़ा समय रहते व्यवस्थित करते रहने से आप बड़ी अव्यवस्था के ढेर से बच जाते हैं।
नियमित रूप से छोटे-छोटे सफ़ाई अभियान: अपनी अलमारी या रसोई में रखे मसालों जैसी विशिष्ट चीज़ों के लिए हर महीने या हर तीन महीने में एक बार देखरेख का समय निर्धारित करें। इससे सामान का जमावड़ा रुकता है और चीजें व्यवस्थित रहती हैं।
घरवालों को शामिल करें: अगर आप जगह शेयर करते हैं, तो सफ़ाई में भी सबकी भागीदारी ज़रूरी है, आप अकेले सबकुछ नहीं कर सकते। परिवार के सदस्यों को हर वस्तु की निश्चित जगह से परिचित कराएं और घर को साफ़ रखने के फ़ायदों के बारे में शिक्षित करें।
घर की डिक्लटरिंग आपको एक नई शुरुआत देती है, आपका मन शांत होता है, और आपकी प्रोडक्टिविटी बढ़ती है। और अगर ऐसा करके कक्कड़ जैसी अव्यवस्थित इंसान एक प्रोफ़ेशनल ऑर्गनाइज़र बन सकतीं हैं, तो क्यों ना आप भी आज से उस मैग्नीशियम कैप्सूल की बोतल के लिए एक प्यारा सा घर ढूंढना शुरू कर दें।




