"मां बनने के लिए मैं कब तक एक आदर्श पुरुष का इंतजार करती, इसलिए मैंने सिंगल मदर बनने का फैसला लिया"
40 वर्षीय शिवानी सिंह एक सिंगल पैरेंट हैं जो सामाजिक परम्पराओं और धारणाओं को बख़ूबी चुनौती दे रही हैं
मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं बड़ी होकर एक सिंगल मदर बनने जैसा अपरंपरागत निर्णय लूंगी। ज़्यादातर लड़कियों की तरह, मुझे भी यही लगता था कि मेरी ज़िंदगी एक पारंपरिक ढंग से आगे बढ़ेगी – पहले प्यार होगा, फिर शादी होगी और फिर बच्चे होंगें। लेकिन मुझे कहां पता था कि ज़िंदगी ने मेरे लिए कुछ और ही प्लान बना रखे हैं। मैं सिडनी, ऑस्ट्रेलिया में एक अकेली बच्ची के रूप में पली-बढ़ी। हालांकि मेरा परिवार हमेशा हमारी परंपराओं और संस्कारों से मज़बूती से जुड़ा रहा, लेकिन फिर भी मेरे माता-पिता ने यह सुनिश्चित किया कि मेरी परवरिश एक संतुलित तरीके से हो जो पारंपरिक मूल्यों और आधुनिक आदर्शों का मिश्रण थी। मेरे प्रति सुरक्षात्मक रवैया होने के बावजूद, उन्होंने मुझे आवश्यक स्वतंत्रता दी ताकि मैं आत्मनिर्भर बन सकूं।
जब मैंने अपने 30वे दशक में कदम रखा, तो मुझे लगा कि अब मैं घर बसाने के लिए तैयार हूं; लेकिन यह जरूरी नहीं कि जीवन में हमेशा आप जब चाहें, जैसा चाहें, वैसा ही हो। कई असफल रिश्तों के बाद, मुझे एहसास हुआ कि वह समय शायद प्यार के लिए उपयुक्त नहीं था और यदि मैं परफेक्ट पार्टनर के इंतज़ार में बैठी रही तो मेरा फर्टिलिटी पीरियड निकल जाएगा। मैं कई पुरुषों से मिली, समय व्यतीत किया, लेकिन किसी में भी मुझे मेरा ‘संभावित पार्टनर’ नहीं दिखता था। इसलिए, आख़िरकार 35 साल की उम्र के आसपास, मैंने गंभीरता से एक बात पर विचार करना शुरू कर दिया जो कहीं न कहीं मेरे दिमाग के किसी कोने में काफी समय से घर किये हुई थी- अपने बलबूते पर IVF के ज़रिए सिंगल मदर बनना।

35 साल की उम्र के आसपास, पैंडेमिक के दौरान, एक हेल्थ इश्यू ने मुझे अपने डॉक्टर से फर्टिलिटी के बारे में बात करने के लिए प्रेरित किया। आप माने या ना मानें, वास्तविकता यही है कि 35 की उम्र के बाद महिलाओं की फर्टिलिटी कम होने लगती है। उन्होंने कहा कि यदि मैं बच्चे चाहती हूं, तो यह संकेत है कि समय रहते मुझे इस बारे में सोचना शुरू कर देना चाहिए। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती जाएगी, इसकी संभावना कम होने लगेगी। उस समय तक, मैंने तय नहीं किया था कि मैं कैसे या कब बच्चा चाहती हूं, लेकिन मैं अपने ऑप्शन खुले रखना चाहती थी। अपनी बायोलॉजिकल क्लॉक को चकमा देने और कुछ समय पाने के लिए, मैंने एग फ्रीज़िंग का सहारा लिया और अपने एग्स फ्रीज़ करा लिए। मैंने अपने माता-पिता को इस बात के लिए धीरे-धीरे तैयार करना शुरू किया कि अगर मुझे कोई उपयुक्त पार्टनर नहीं मिला, तो मैं खुद ही बच्चा पैदा करने के बारे में सोच रही हूं। गोद लेना भी एक ऑप्शन था, लेकिन यह देखते हुए कि गोद लेने की प्रक्रिया कितनी लंबी और जटिल हो सकती है, मेरा अगला ऑप्शन अपने आप IVF बन गया।
38 साल की होते ही, मैंने तय कर लिया कि अब मैं एक बच्चे को जन्म देने के लिए तैयार हूं। सामाजिक परम्पराओं और प्रतिबंधों के कारण मैं मां बनने के अपने सपने को खत्म होते नहीं देख सकती थी। मैं पहले से ही आर्थिक रूप से स्वतंत्र थी और IVF के ज़रिए सिंगल मदर बनने के लिए तैयार थी।
इस बारे में अपने माता-पिता से बात करना इस प्रक्रिया का सबसे कठिन हिस्सा था। वे हमेशा मेरी पसंद-नापसंद का समर्थन करते थे, लेकिन इस बार उनकी प्रतिक्रिया थोड़ी अलग थी। यह कोई काल्पनिक चर्चा नहीं थी – यह वास्तविकता बनने वाली थी। सबसे ज्यादा आश्चर्य तो मुझे तब हुआ जब मेरे पिता, जो थोड़े रूढ़िवादी विचारों वाले हैं, ने तुरंत मेरा समर्थन किया। उन्होंने कहा, “अब समय बदल रहा है; तुम्हारे इस दिशा में कदम उठाने के लिए मुझे तुम पर बहुत गर्व है।” मेरी मां ने शुरू में बहुत आनाकानी की और उन्हें मनाने में थोड़ा समय लगा, क्योंकि शायद उन्हें इस बात की चिंता थी कि लोग क्या कहेंगे। लेकिन आखिरकार, वह मान गईं, वैसे भी उन दोनों के सपोर्ट के बिना मैं आगे नहीं बढ़ सकती थी।

मैं दिल्ली में जॉब करने लगी थी, लेकिन आईवीएफ के प्रोसीजर के लिए मैं अपने पेरेंट्स के पास वापस सिडनी लौट आई। चूंकि मैंने अपने एग्स पहले से ही फ्रीज़ करा रखे थे, इसलिए एम्ब्रयो प्राप्त करने की प्रक्रिया आसान हो गई थी। डोनर का चयन करना एक अभिन्न कदम था – हम एक ऐसे व्यक्ति की तलाश में थे जो सामाजिक और शारीरिक रूप से हमारी फैमिली और हेरिटेज से, जितना संभव हो सके, मिलता जुलता हो। ताकि, मेरा बच्चा बड़ा होकर अपनी शारीरिक पहचान पर सवाल नहीं उठाए। कई डोनर प्रोफाइल छान मारने के बाद आखिरकार हमें एक उपयुक्त डोनर मिला। मैंने सुना था कि IVF इमोशनली और फाइनेंशिअली दोनों रूप से थका देने वाली प्रक्रिया हो सकती है, लेकिन मैं भाग्यशाली थी कि मेरा एम्ब्रयो ट्रांसफर पहली बार में सफल रहा, जो कि आमतौर पर बहुत मुश्किल होता है।
जब मुझे पता चला कि मैं प्रेग्नेंट हूं तो मैं एकाएक बहुत अभिभूत हो गई, एक साथ कई भाव उत्पन्न हुए, बहुत ख़ुशी हुई और साथ ही डर भी लगा। लेकिन, मैं काफी हद तक तैयार थी। कंसीव करने के बाद, मैं वापस दिल्ली आ गई, और मेरे पेरेंट्स सिडनी में ही रहे। वे अक्सर मुझसे मिलने आते-जाते रहते थे, लेकिन फिर भी कई बार मुझे बहुत अकेलापन महसूस होता था। इस तरह के निर्णय को निभा पाने के लिए खुद पर पूरा भरोसा होना बहुत जरूरी है। डॉक्टर के अपोइंटमेंएट्स पर अकेले जाना मुझे बहुत अखरता था, लेकिन इन भावनाओं पर मैंने ज्यादा ध्यान नहीं दिया और कभी भी अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। इस दौरान जॉब की व्यस्तता मेरे लिए एक वरदान साबित हुई।
डिलीवरी के बाद, मैं पोस्टपार्टम डिप्रेशन के दौर से गुज़री। हालांकि मेरे पास अपना मजबूत सपोर्ट सिस्टम था, फिर भी कई बार मुझे एक पार्टनर की चाह महसूस होती थी जिसके साथ मैं अपने इन अनुभवों को बांट सकती। फिर भी, मुझे कभी भी अपने फैसले पर पछतावा नहीं हुआ। बल्कि मुझे लगा कि काश मैंने यह कदम पहले उठा लिया होता। मुझे लगा था कि लोग मेरी आलोचना करेंगे और IVF के ज़रिए सिंगल मदर बनने के मेरे फ़ैसले पर सवाल उठाएंगे। लेकिन, जब लोगों ने मेरे इस फैसले को अपनाया और मुझे प्रोत्साहित किया तो मैं आश्चर्यचकित हो गई। दिल्ली के हॉस्पिटल का मेडिकल स्टाफ़ अविश्वसनीय रूप से सहायक था, और रिश्तेदारों और दोस्तों ने मेरी बहुत प्रशंसा की। लोग हैरान थे कि मैंने इतना साहसिक कदम उठाया, और ऐसी प्रतिक्रियाओं ने मुझे और ज्यादा सशक्त महसूस कराया।
IVF के ज़रिए सिंगल मदर बनने का मेरा सफर अधिकतर पॉजिटिव रहा, लेकिन फिर भी कुछ नेगेटिव घटनाएं सामने आईं। मुझे याद है कि अस्पताल के पेपर वर्क को पूरा करते समय, एक कर्मचारी ने फॉर्म में पिता का विवरण भरने के लिए मुझ पर बहुत जोर डाला। वह मानने को तैयार नहीं था कि मैंने यह सब, बिना पति के, अपने बलबूते पर किया है। मेरे सर्कल की कई महिलाओं ने मुझसे संपर्क किया और कहा कि उन्होंने भी IVF के ज़रिए सिंगल मदर बनने के बारे में कई बार सोचा है, लेकिन वे सामाजिक लांछन से डरती थीं। हमें इन चर्चाओं को नॉर्मल बनाने की जरूरत है, ताकि सामाजिक जागरूकता बढ़े और लोग जानें कि फैमिली बनाने के कई तरीके हैं और ये सभी मान्य हैं।
हमारा समाज अक्सर पारंपरिक पारिवारिक संरचना को बढ़ावा देता है लेकिन मेरे अनुभवों ने मुझे यही सिखाया है कि प्यार और देखभाल किसी शादी या पुरुष-केंद्रित पारिवारिक संरचना पर निर्भर नहीं होते हैं। परिवार कई तरह के होते हैं और सबसे ज़्यादा मायने रखता है – आपके द्वारा दिया जाने वाला प्यार और सुरक्षित वातावरण। यह धारणा गलत है कि सिंगल पेरेंट्स के बच्चे खुश या सफल नहीं हो सकते, और इसमें कोई सच्चाई नहीं है। मैं अपने बेटे को अपने परिवार और दोस्तों के एक करीबी नेटवर्क के प्यार और समर्थन के साथ बड़ा कर रही हूं, और उसके आसपास वे लोग हमेशा रहेंगें जो उससे बहुत प्यार करते हैं।

हर वो महिला जो खुद को सामाजिक अपेक्षाओं के जाल में फंसा हुई महसूस करती है, मैं उससे कहना चाहती हूं कि यदि आपको पारंपरिक तरीका सही नहीं लगता है तो आपको उसका पालन करने की ज़रूरत नहीं है। आपको अपनी पसंद का जीवन जीने के लिए अनुमति की ज़रूरत नहीं है। लेकिन यदि आप इनसे हटकर कुछ अलग करने का फ़ैसला करती हैं, तो आपको संभवतः दो चीज़ों की ज़रूरत होगी- आर्थिक आज़ादी और विरोधियों का दृढ़ता के साथ सामना करने की हिम्मत। क्योंकि हमारा समाज आलोचना करने में कभी नहीं चूकता, और आज जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूं तो यही आलोचना और अस्वीकृति मेरी लिए सबसे बड़ी चुनौती थी।
जहां तक प्यार की बात है? मैं आज भी इसके लिए तैयार हूं, लेकिन अब यह मेरी प्राथमिकता नहीं है। अब मेरा फोकस मेरे दोनों बच्चों की देखभाल पर है – मेरा एक साल का बेटा और मेरा क्रिएटिव बिज़नेस। मेरे बेटे की मौजूदगी ने उस खालीपन को भर दिया है जो मैं कभी रोमांटिक पार्टनर की अनुपस्थिति में महसूस करती थी। मैं फिर भी आशा करती हूं कि भविष्य में मुझे एक उपयुक्त पार्टनर मिले, और अगर ऐसा होगा, तो यह मेरे लिए एक बोनस जैसा होगा।
यह शिवानी पाठक को बताया गया एक व्यक्तिगत विवरण है




