10 में से 9 को 'ना' कहने में झिझक होती है, लेकिन इन महिलाओं ने लोगों को खुश करना छोड़ दिया है
अपनी बात पर कायम रहना आसान नहीं है, लेकिन सेल्फ-केयर के लिए ‘ना’ कहना आवश्यक है
मैंने कई बार महिलाओं को ना चाहते हुए भी ऐसे काम करते देखा है जो वे सिर्फ इसलिए करती हैं ताकि दूसरों को ‘चोट’ ना पहुंचे। वे अपने ससुराल वालों को खुश करने के लिए सप्ताह में कई बार फोन करती हैं, या दूसरों की अपेक्षाओं पर खरा उतरने के लिए शादियों में दुल्हन की तरह सजधज के जाती हैं। एक महिला के ‘ना’ नहीं कह पाने के पीछे या तो तानों का डर होता है या इस बात की दुविधा होती है कि लोग क्या कहेंगें। ब्यूटी ब्रांड पॉन्ड्स द्वारा की गई एक स्टडी में पाया गया कि दस में से नौ भारतीय महिलाएं अपनी जरूरतों को व्यक्त करने से खुद को रोकती हैं। दिल्ली की, 55 वर्षीय, होम मेकर रीता वशिष्ठ की कहानी भी कुछ अलग नहीं हैं। हिंदी में बीए और बीएड की डिग्री के साथ, उन्होंने टीचिंग में करियर बनाने का सपना देखा था, लेकिन जब उन्हें उनके पति का सपोर्ट नहीं मिला, तो उन्होंने अपनी महत्वाकांक्षाओं को त्याग दिया। दशकों बाद, वशिष्ठ आज भी अपनी चुप्पी के परिणामों से जूझ रही हैं (अपराधबोध महसूस किये बिना भी आप ‘ना’ कहना सीख सकते हैं)। भारतीय संस्कार अक्सर हमें हर बात पर सहमत होने के लिए बाध्य करते हैं, लेकिन, हर समय लोगों को खुश करना हम औरतों को बहुत महंगा पड़ता है – विशेषकर हमारी मेंटल हेल्थ के लिए। यदि इस समय आप सिर हिलाते हुए यही सोच रहीं हैं कि ‘ना’ कहना इतना कठिन क्यों है, तो आप अकेली नहीं हैं।
बड़े होते हुए, मैंने हमेशा अपनी मां को लोगों को खुश करने में लगा देखा, उन्हें किसी को ना कहने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ता था, खासकर मेरी नानी को, जिन्होंने मेरे पालन-पोषण में मेरी मां की बहुत मदद की थी। वे अपने नियम और कायदे मेरी मां पर थोपती रहीं, जो उनका पालन करने के लिए बाध्य महसूस करती थीं, क्योंकि वह मेरी नानी की मदद की आभारी थीं। इस कारण, मेरी नानी लगभग हर मामले में दखल देती थीं – घर के खर्चों से लेकर मेरी परवरिश तक। यह दखलंदाजी अक्सर मेरी मां और मेरे बीच झगड़े का कारण बन जाती थी।
मुंबई स्थित साइकोलॉजिस्ट जेनिशा शाह कहती हैं, “लोगों को खुश करना आम तौर पर एक अच्छे और मददगार व्यक्ति की निशानी समझी जाती है, और महिलाएं खुद को उसी रूप में प्रस्तुत करना चाहती हैं। समस्या तब उत्पन्न होती है जब वे अपनी सीमाएं निर्धारित करने और अपना पक्ष रखने में सक्षम नहीं हो पाती, जिसके परिणामस्वरूप वे भावनात्मक तौर से पूरी तरह थका हुआ महसूस करने लगती हैं।”
यहां चार महिलाएं अपने अनुभव बांट रही हैं कि उन्होंने कैसे लोगों को खुश करना बंद कर दिया और अपनी मानसिक शांति पुनः प्राप्त की।
छोटी शुरुआत करें और अपनी सीमाएं निर्धारित करें
विजी वी, मुंबई की 62 वर्षीय रिटायर्ड बैंकर, अपने माता-पिता से मिलने जाने के लिए भी, सालों से अपनी सास से अनुमति लेती चली आ रही थीं। लेकिन एक दिन, उन्होंने तय किया कि बहुत हो गया। मंजूरी मांगने के बजाय, उन्होंने बस अपनी सास को सूचित करना शुरू लिया कि वह जा रही हैं। वह बताती हैं, “मैंने इस मुद्दे को अनदेखा करना बंद कर दिया और अपने विचारों को अधिक से अधिक व्यक्त करना शुरू किया। धीरे-धीरे मैं सहज महसूस करने लगी और समय के साथ हमारे रिश्ते में भी सुधार आया।”
सबक? भले ही छोटे मुद्दों से शुरुआत करें, लेकिन शुरुआत अवश्य करें। चाहे आप किसी तपते दिन में बागवानी करने में मदद करने से इनकार करना चाहें या किसी फैमिली फंक्शन में जाने से मना कर दें, ‘ना’ कहने की प्रैक्टिस करें। आपको ऐसी सीमाएं निर्धारित करनी होंगी जिनमें आप सहज महसूस करते हैं। अन्यथा, आप लगातार नाराजगी से जूझते रहेंगे।

बड़े होते हुए, मैंने तय किया कि मैं हमेशा अपनी बात पर दृढ़ रहूंगी, नाकि अपनी मां की तरह, और भले ही इसके लिए मुझे अपनी मौसी और दादी से ताने सुनने पड़ते थे, जो कभी-कभी बहुत दुख पहुंचाते थे। समय के साथ, मुझे फर्क पड़ना बंद हो गया, जो बहुत फायदेमंद साबित हुआ, खासकर ऐसे परिचितों से निभाते समय, जिन्हें मना करना मुश्किल होता है।
दृढ़ रहें, भले ही दूसरे (और आप खुद) आश्चर्यचकित हो जाएं
लोगों को खुश रखने के कभी-कभी गंभीर परिणाम हो सकते हैं, यह मुंबई स्थित पूर्व बैंकर शालिनी नागराजन* ने मुंह के बल गिरने के बाद सीखा। अपने पति के नाम पर उनके द्वारा खरीदे गए एक फ्लैट से जुड़े मसलों की बागडोर उन्होंने अपने पिता के हाथों सौंप रखी थी, और उन्होंने शालिनी को दरकिनार करते हुए, उनकी सहमति के बिना ही उस प्रॉपर्टी को बेच दिया। वह बताती हैं, ”इससे मेरे और मेरे बच्चों के बीच दरार पैदा हो गई क्योंकि उन्हें लगा मैंने उनकी सलाह नहीं ली।”
उनके जीवन में टर्निंग पॉइंट तब आया जब वह ब्रांच मैनेजर की पोस्ट पर थी। वह बताती हैं, “मेरे सीनियर चाहते थे कि मैं एक संदिग्ध लोन को पास कर दूं, लेकिन मैंने इनकार कर दिया। वे सकते में आ गए थे, लेकिन मैं अपने फैसले पर अडिग रही। तब मुझे विनम्रता और दृढ़ता के साथ कहे गए ‘ना’ की ताकत का एहसास हुआ।” शालिनी अब बिना किसी विवाद के अपना पक्ष रखने के लिए हर समय कूटनीति का सहारा लेती हैं और इसमें माहिर हो चुकी है।
शाह के अनुसार, लोगों को खुश रखने के परिणाम लॉन्ग-टर्म हैं – अपनी पहचान और आत्मसम्मान पर प्रहार, तुच्छ महसूस करना, और खुद पर सवाल उठाना कि क्या आप जो हैं उसके लिए पसंद किए जाते हैं या सिर्फ आपकी मौन स्वीकृति के लिए। शाह कहती हैं कि भले ही यह बहुत छोटी बात हो (जैसे चाइनीस रेस्तरां के बजाय मैक्सिकन रेस्तरां में जाना हो), लेकिन आपको अपना पक्ष रखना चाहिए।
अपनी जरूरतों को स्पष्ट रूप से व्यक्त करें
वशिष्ठ ने अपना अधिकांश जीवन दूसरों की उम्मीदों पर खरा उतरने में बिताया है, लेकिन जब बात उनकी बेटी की शादी की आई तो उन्होंने किसी तरह का समझौता नहीं किया। जब उनके ससुराल वालों को लगा कि उन्हें ‘औपचारिक’ रूप से आमंत्रित नहीं किया गया और इस कारण उन्होंने उपस्थित होने से इनकार कर दिया, तो वशिष्ठ अटल रहीं। वह कहती हैं, “मैं जानती थी कि मैं ग़लत नहीं थी। शादी उनके बिना हुई और मुझे इसका अफसोस नहीं है।” इससे यही पता लगता है कि दूसरों को खुश करने के बजाय अपनी मानसिक शांति को चुनना कितना स्वतंत्र महसूस कराता है।

“कभी-कभी, जो लोग दूसरों को खुश करने में लगे रहते हैं, वे स्वयं की देखभाल को अनदेखा कर देते हैं, जैसे डॉक्टर के अपॉइंटमेंट को नज़रअंदाज़ कर देना। आगे जाकर यह सभी बातें धीरे-धीरे एंग्जायटी का कारण बनने लगती है। शाह कहती हैं, ”आपको लगता है कि आपका बड़ी चालाकी से इस्तेमाल हो रहा है और इसलिए आप दबी आवाज़ में या व्यंग्यात्मक टिप्पणियों के माध्यम से अपनी नाराज़गी को अभिव्यक्त करने लगते हैं।”
जो आपके लिए मायने रखता है उस पर समझौता न करें। विजी शेयर करती हैं, “मेरी बेटियों ने बिना किसी अपराधबोध के अपनी जरूरतों को स्पष्ट तौर पर व्यक्त करना सीख लिया है, और मैं सोचती हूं कि काश मैंने भी ऐसा पहले किया होता।”
यह बर्नआउट का एकतरफ़ा टिकट है
पुणे स्थित, 54 वर्षीय, डिनाज़ रोहिंटन दस्तूर, खुद को एक विनम्र इंसान मानती हैं, जिन्हें दूसरों को खुश करने में खुशी मिलती है। दस्तूर, जिनके लिए ‘ना’ कहना बड़ा मुश्किल है, कहती हैं, “मैं, स्वभाव से, एक मृदुभाषी व्यक्ति हूं और दूसरों को खुश रखने में मुझे खुशी मिलती है। निःसंदेह, कभी-कभी इसका मुझ पर दुष्प्रभाव भी पड़ा है, खासकर तब जब वह व्यक्ति खुश या आभारी नहीं होता। मैं अस्वीकृत और तनावग्रस्त महसूस करती हूं।”
50 वर्ष की उम्र में, महज़बीन अनवर की पड़ोसी ने एक बार उनसे पूछा कि क्या वह उसके फैमिली फंक्शन के लिए कुकिंग में उसकी मदद कर सकती हैं। अब लंदन में रहने वाली, 66 वर्षीय महज़बीन कहती हैं, “मुझे पता था कि वह कोई मदद नहीं करने वाली थी; वह बस निर्देश देती और उम्मीद करती कि सारा काम समय से पूरा हो जाएगा। मैं यह नहीं चाहती थी, इसलिए मैंने विनम्रता और दृढ़ता के साथ, यह कहते हुए बात टाल दी कि मुझे कुछ और काम हैं और सुझाव दिया कि वह एक कैटरर को काम पर रख सकती है। उसे मैसेज मिल गया, उसने खुद ही अपना काम संभाला और मैंने अपना पहला ‘नहीं’ सफल होते हुए देखा।”

रिप्रेज़ेंटेटिव फोटो: अनस्प्लैश.कॉम पर जोनाथन बोरबा
युवा पीढ़ी को उनकी सलाह: आप अपनी बात रखते हुए विनम्रता से ‘ना’ कह सकते हैं। “मुझे ध्यान में रखने के लिए धन्यवाद लेकिन इस बार मैं आपकी मदद नहीं कर पाऊंगी।” छोटी शुरुआत करें और, समय के साथ, आपका आत्मविश्वास बढ़ता जाएगा।
मेरा मानना है कि कई बार कोशिश करके एक बीच का रास्ता भी निकाला जा सकता है। एक मलयाली होने के नाते, मेरी दिली ख्वाहिश थी कि मैं अपनी शादी में ऑफ-वाइट कसावु साड़ी पहनूं। लेकिन, मेरी तमिल ब्राह्मण सास ने इस बात पर जोर डालते हुए कहा कि हमारी संस्कृति में सफेद रंग दुल्हन के लिए उपयुक्त नहीं है। मैं भी अपने निर्णय पर दृढ़ रही और अंततः हमने समझौता कर लिया: मैंने शादी के लिए कांचीपुरम सिल्क की साड़ी पहनी और रिसेप्शन के लिए कसावु साड़ी पहन ली।
‘ना’ कहना और अपनी बात पर कायम रहना आसान नहीं है, लेकिन सेल्फ-केयर के लिए यह आवश्यक है। इन महिलाओं से सीखें जिन्होंने सीमाएं तय करने और खुद को अभिव्यक्त करने में महारत हासिल कर ली है। लोगों को खुश करते-करते आपकी पहचान खत्म होने लगती है और आपके आत्मविश्वास को नुकसान पहुंचता है। सीधे हां में हां मिलाने के बजाय, “हां, लेकिन” वाले नज़रिये के साथ आगे बढ़ें, ताकि आपको अपने पक्ष पर बातचीत करने का समय मिल सके। यदि आमने-सामने एकदम से मना कर देना आपका स्टाइल नहीं है, तो शुरुआत में एक बीच का समाधान निकालने का प्रस्ताव रखें।
*अनुरोध पर नाम बदल दिए गए हैं




