घर पर रहने वाली माएं भी बर्नआउट का शिकार होती हैं, उनकी मेंटल हेल्थ पर चर्चा आवश्यक है
“तुम पूरा दिन घर पर रहकर करती क्या हो?”
सोफे पर लेटे हुए जब मैं अपने बच्चे को थपथपाते हुए सुला रही थी, तो मेरा ध्यान पिछली शाम राह चलते मिली एक आंटी जी की बात पर चला गया। उन्होंने पूछा: “तो क्या तुमने अपने बच्चे के जन्म के बाद दोबारा ऑफिस जाना शुरू नहीं किया? तुम पूरा दिन घर पर रहकर करती क्या हो?” सही बात है, सुबह से शाम तक के खाने की प्लानिंग करना, डायपर बदलना, स्कूल छोड़ना और स्कूल से वापस लाना, पढ़ाना, बच्चों को बिज़ी रखने के लिए उनके लिए अलग-अलग तरह की एक्टिविटी और प्ले डेट्स प्लान करना, उनके आउटडोर प्लेटाइम पर निगरानी रखना, नहलाने और सुलाने के साथ-साथ उनकी मेंटल, फिज़िकल और इमोशनल जरूरतों की जिम्मेदारी उठाने के बावजूद भी यदि आप यह कह सकते हैं कि घर पर रहने वाली माएं ‘कुछ नहीं करतीं’ तो ठीक है, आप सही हैं – मन तो किया कि उस महिला को यह सब बताऊं लेकिन फिर बड़प्पन दिखाते हुए मैंने मुस्कुराकर गुड बाय कहने का फैसला लिया, और फिर घर जाकर अकेले में अपने इमोशनल ब्रेकडाउन का सामना किया।
यह समझ आने से काफी पहले कि बच्चे कहां से आते हैं, मैं अपने लिए केवल दो चीजें चाहती थी: एक मां और एक लेखिका बनना। आज, मैं एक फुल टाइम घर पर रहने वाली मां हूं और पार्ट-टाइम फ्रीलांस लेखिका भी हूं। मैं सौभाग्यशाली हूं कि मुझे अपने दोनों सपनों को साकार करने का मौका मिला, लेकिन क्या बताऊं, कि जब मैं अपने द्वारा बनाए गए उस छोटे से इंसान को घर लाई तो मुझे कैसा झटका लगा।
मुझे इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि शुरू के एक सप्ताह में ही बाहरी लोगों से संपर्क की कमी, और केवल बच्चे की देखभाल करते हुए अपनी खुद की भावनाओं को भी संभालना, मुझे कुछ ही दिनों पागलपन की कगार पर ले जा सकता है। कई बार अपने 2 साल के चीखते हुए बच्चे से छोटी-छोटी बातों पर बहस से बचने के लिए, कि टूटा हुआ केला भी खाया जा सकता है, मैंने अपने माता-पिता को, जो 30 मिनट की दूरी पर रहते हैं, ना जाने कितने वीडियो कॉल लगाए, ताकि आमने-सामने बातचीत करके थोड़ा नार्मल महसूस कर सकूं। कई महीनों तक – कोई छुट्टी नसीब नहीं होना, शांति से बैठ कर एक कप चाय तक न पी पाना, या केवल एक पूरी रात चैन की नींद नहीं सो पाना – गंभीर मेंटल बर्नआउट का कारण बन सकता है। केवल कामकाजी महिलाएं बर्नआउट का शिकार नहीं होतीं, घर पर रहने वाली माएं भी होती हैं। और मुझे इस बात की समझ तब आई जब मैं खुद इस दौर से गुजर रही थी। इसलिए अब, जब कोई मुझे यह कहता है कि अपने बच्चे के साथ घर पर रहने वाली माएं ‘कितनी भाग्यशाली’ होती हैं या मैं “कुछ नहीं करती” क्योंकि मैं घर की आय में योगदान नहीं करती, तो मैं अपने फुल टाइम पैरेंट बनने के निर्णय पर सवाल उठाने पर मजबूर हो जाती हूं।
यदि मेरा परिवार मुझे सपोर्ट नहीं करता – जिन्होंने मेरी हर ज़रूरत के समय मेरी मदद की और हमेशा मेरा हौंसला बढ़ाया – मेरा दिमाग अब तक ख़राब हो चुका होता। और जितना ज़्यादा मैं अपने जैसी घर पर रहने वाली माओं से बात करती हूं, उतना ज़्यादा मुझे एहसास होता है कि मैं अकेली नहीं हूं – बस हम इस बारे में पर्याप्त चर्चा नहीं करते हैं।

जमशेदपुर की 32 वर्षीय कंटेंट क्रिएटर और मैटरनल मेंटल हेल्थ एडवोकेट, श्रेया मित्रा कहती हैं, “घर पर रहने वाली माएं जिस डिप्रेशन से गुजरती है वह वास्तविक है। अधिकांश महिलाएं खुद को महत्वहीन समझने लगती हैं और अपना आत्म-सम्मान खो देती हैं। वे दैनिक जीवन के नीरस सांसारिक कार्यों में ऐसी फंस जाती हैं, जिससे उनका आत्मविश्वास कम होने लगता है और वे अकेलेपन की शिकार होने लगती हैं। ऐसी धारणाएं कि घर पर रहने का मतलब है आराम करना, उनके आत्मविश्वास को और भी बदतर बना देती है।”
श्रेया पेशे से वकील थी, लेकिन जब वे शादी के बाद जमशेदपुर चली गईं तो उन्हें काम नहीं मिला और वह अपनी पसंद से नहीं, बल्कि परिस्थितियों के कारण घर पर रहकर अपने बच्चे को संभालने लगीं (वह अकेली ऐसी मां नहीं हैं)। वह बताती हैं, “मैं उन लोगों में से थी जिसे केवल एक घर पर रहने वाली मां के रूप में जीवन नहीं बिताना था लेकिन धीरे-धीरे मुझे इसका महत्व समझ में आया। सराहना की कमी भले ही आपको महत्वहीन महसूस करा सकती है, लेकिन आपको अपना महत्व खुद समझना होगा।”
और घर पर रहने वाले अधिकांश पेरेंट्स के लिए यह सबसे कठिन बात है।
मेरे बेटे के प्लेस्कूल में एक साथी पैरेंट, मुंबई की सकीना मर्चेंट, एक चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं, जो अपनी बेटी के जन्म से पहले एक टॉप अकाउंटिंग फर्म में काम करती थीं। उन्होंने अपनी प्रेगनेंसी के दौरान नौकरी छोड़ दी और उन्हें अपने इस फैसले पर कभी पछतावा नहीं हुआ, तब भी जब दूसरों ने उन्हें नीचा दिखाने की पूरी कोशिश की। मर्चेंट बड़े गर्व के साथ कहती हैं, “मुझे कई बार सुनना पड़ा, ‘तुम अपनी डिग्री बर्बाद कर रही हो’। लेकिन, मेरा मानना है कि यदि आप अपने बच्चे के प्रारंभिक वर्षों में शामिल नहीं होते हैं, तो यह आपका नुकसान है। अब, जब लोग मेरी बेटी के व्यक्तित्व को देखते हैं, तो उन्हें मेरे घर पर रहकर उसकी परवरिश करने के फैसले पर उंगली उठाने की हिम्मत नहीं होती है।”
कई स्टडीज़, जाने माने साइकोलोजिस्ट और साइकोलॉजिकल थ्योरी, जैसे अल्बर्ट बंडुरा की सोशल लर्निंग थ्योरी और जीन पिअगेट की बच्चों में कॉग्निटिव डेवलपमेंट थ्योरी के अनुसार, पेरेंट्स को एक बच्चे का सबसे पहला शिक्षक माना जाता है। बच्चे जो देखते हैं उससे ज़्यादा सीखते हैं बजाय उसके जो हम उन्हें बोल कर सिखाते हैं, और इसमें यह भी शामिल है कि उनके माता-पिता के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है।
काउंसलिंग साइकोलोजिस्ट तान्या वसुनिया बताती हैं, “दुर्भाग्य से, हमारा समाज फाइनेंशियल रूप से सफल व्यक्ति को ज़्यादा महत्व देता है। यही कारण है कि घर पर रहने वाली माएं ऐसा महसूस करती हैं जैसे वे परिवार में पर्याप्त योगदान नहीं दे पा रही हैं। अफसोस की बात है, कि कई पति भी यही मानसिकता रखते हैं। इसका घर पर रहने वाली माओं पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है और उनमें डिप्रेशन और एंग्जायटी पैदा हो सकती है। सच तो यह है कि पेरेंटिंग दुनिया के सबसे कठिन कामों में से एक है और इसका मूल्य लगाना असंभव है। जो माएं इन भावनाओं से जूझ रही हैं उन्हें एक सपोर्ट सिस्टम ढूंढने की आवश्यकता है जो उन्हें प्रोत्साहित कर सके।”

और जिनके पास कोई मदद नहीं है, उनके लिए तो यह काम और भी ज़्यादा कठिन हो जाता है। एक बच्चे के शेड्यूल के अनुसार जीना, उनकी भावनाओं को समझना, एक मार्गदर्शक के रूप में उन्हें उनके आसपास की दुनिया को समझने में मदद करना – यह वह कठिन परिश्रम है जो आमतौर पर अनदेखा रह जाता है और घर में आय भी नहीं लाता है। कई घर पर रहने वाली माओं के लिए, कुछ घंटो की शांति पाने के लिए के लिए भी, अपने बच्चे को लेकर किसी और पर भरोसा करना, एक आंतरिक लड़ाई है। मुझे तो कई बार अपने बेटे को उसके पिता के साथ छोड़ने में भी झिझक होती थी कि कहीं मुझे उससे अलग होने के कारण एंग्जायटी ना होने लग जाए। लेकिन यह बहुत जरूरी है। मर्चेंट समझाती हैं, “अपने बच्चे के साथ-साथ, आपसे एक विशिष्ट तरीके से घर संभालने की अपेक्षा करना गलत है। कई बार ऐसा होता है जब पानी सर से ऊपर चला जाता है और मेरे गुस्से का बांध टूट जाता है। लेकिन अब मैं इन संकेतों को समझने लगी हूं और ऐसी परिस्थिति में पहुंचने से पहले ही मैं अपने पति को आगे आकर मोर्चा संभालने के लिए कह देती हूं।”
मैंने भी सीख लिया है कि कप खाली होगा तो आप पिलाओगे क्या, और केवल शांत और संतुष्ट मन के साथ ही हम बच्चों की स्वस्थ और खुशहाल परवरिश कर सकते हैं। इसलिए अब मैंने अपने जाने-पहचाने लोगों पर ज़्यादा निर्भर करना शुरू कर दिया है – जिनमें मेरे प्यारे पड़ोसी भी शामिल हैं जो मेरे बेटे से बहुत प्यार करते हैं – और अब मैं ज़रूरत पड़ने पर मदद मांगने से नहीं हिचकिचाती। मेरे फेवरेट दिन वो होते हैं जब मैं अपने पेरेंट्स के घर पर होती हूं, क्योंकि मुझे पता होता है कि मैं लिखने के लिए थोड़ा समय निकाल पाउंगी। मैं दिन के ख़त्म होने का बेसब्री से इंतज़ार करती हूं जब मेरे पति घर लौटने के बाद हमारे बच्चे के साथ समय बिताएंगे। जब वह सोने से पहले उसे कहानियां सुनाते हैं और मुझे शांति से पांच मिनट बिस्तर पर लेटने को मिलता है, वह मेरा पसंदीदा समय होता है। अब मैं वीकेंड पर अपने लिए थोड़ा समय निकालने की कोशिश करती हूं, क्योंकि मेरे पति कुछ घंटों के लिए मेरा कार्यभार संभाल सकते हैं, इस तरह मुझे भी अपने पसंदीदा शो देखने के लिए कुछ घंटे मिलते हैं या शांति से कोई किताब पढ़ने का मौका मिलता है। घर पर रहने वाली माओं को भी यह याद रखने की ज़रूरत है कि बच्चा होने से पहले वह क्या थीं और आज भी उनका एक अस्तित्व है और इसलिए मातृत्व में खुद को पूरी तरह से खोने की आवश्यकता नहीं है।
मर्चेंट का भी यही मानना है: “डिलीवरी के चार महीने बाद भी, मैं पोस्टपार्टम डिप्रेशन महसूस कर रही थी और मैंने अपने गायनाकोलॉजिस्ट से बात की। उन्होंने कहा कि मैं अपने बच्चे की बेहतर देखभाल करने के लिए खुद को प्राथमिकता दूं। तो अब, मैं उन चीजों पर दोबारा गौर कर रही हूं जो मुझे मां बनने से पहले करना पसंद था, जैसे थिएटर में फिल्में देखना। मेरे पति और मैं हाल ही में, हमारे बच्चे के जन्म के 2.5 साल बाद, एक साथ फिल्म देखने गए और सच कहूं तो यह एक अद्भुत अनुभव था।”
घर पर रहने वाली माएं अपने काम पर कैसे गर्व महसूस करें? वसुनिया सलाह देती हैं, “मैं अपने क्लाइंट्स से एक दिन में वे जो कुछ भी करती हैं उसे एक जर्नल में लिखने की सलाह देती हूं। यह डॉक्यूमेंटेशन उन्हें परिवार पर उनके प्रभाव का अहसास दिलाता है।” वे और श्रेया दोनों समान टिप्स देतीं हैं कि माओं को खुद को प्राथमिकता देना सीखना चाहिए – एक्सरसाइज़ करें, दिन में 15 मिनट भी कुछ ऐसा करने के लिए निकालें जिससे उन्हें खुशी मिले, मेडिटेशन करें, यदि आवश्यक हो तो थेरेपी लें और जब भी संभव हो घर से बाहर निकलें।
वसुनिया का दिया निष्कर्ष बिलकुल सही है, “घर पर रहकर अपने बच्चे की देखभाल करना एक बहुत चुनौतीपूर्ण काम है, खासकर आज की दुनिया में जहां किसी भी प्रकार के, छोटे से छोटे, श्रम के लिए वेतन के उम्मीद की जाती है। इतिहास गवाह है, महिलाओं को अपनी अहमियत समझाने के लिए हमेशा से संघर्ष करना पड़ा है और विडंबना यह है कि हम चाहे कितना भी आगे बढ़ते जाएं, हमारे लिए लक्ष्य बदलते रहते हैं।”
तो अगली बार जब मेरा बच्चा मुझसे चिपककर सो रहा होगा, जो उसके लिए दुनिया की सबसे सुरक्षित जगह है, तो मुझे यही याद आएगा। पेरेंट्स कहीं भी हों वर्किंग पेरेंट्स ही होते हैं – अब समय आ गया है कि दुनिया घर पर रहने वाली माओं को भी इसी नज़र से देखे।




