मेरे ससुराल वालों ने मेरे पति की मौत का जिम्मेदार मेरे करियर को ठहराया
एक सफल करियर बनाने के लिए सामाजिक दबावों और पारिवारिक अपेक्षाओं को पार करने वाली एक महिला की आपबीतीमैं अपनी उम्र के 60वे दशक में हूं और मैं हर दिन अपने स्वर्गीय पति के बारे में सोचती हूं। जब आप किसी को अचानक खो देते हैं, तो ऐसी कई अधूरी बातें रह जाती हैं जिनके साथ आपको जिंदगी भर रहना पड़ता है। ऐसी कितनी बातें जो उन्होंने कहीं, और जो उन्हें कहनी चाहिए थी वह कभी नहीं कहीं। जो बातें मैं चाहती थी कि वह मेरे सपोर्ट में अपने परिवार से कहें, ना कि मुझे समझाएं कि मैं उनके तानों और उपहास को अनदेखा करती रहूं। यदि उन्होंने मेरे पक्ष में कुछ कहा होता तो उनके परिवार ने अवश्य सुना होता। मेरा तो कुछ भी कहना, उन्हें निश्चित रूप से स्वीकार नहीं था। उनके अनुसार, मेरा अपने पति से अधिक पैसा कमाना हमारे घर के टूटने का अहम कारण था।
जब मैं पहली बार अपने पति से मिली थी तो मेरा शादी करने का कोई इरादा नहीं था। हम दोनों युवा थे, दोस्तों के माध्यम से मिले थे और अपना-अपना करियर बनाने पर फोकस कर रहे थे। मेरी मेडिकल की ट्रेनिंग खत्म होने वाली थी और उन्होंने एक आर्किटेक्चर फर्म में काम करना शुरू किया था। जब हमारे दोस्तों ने पहली बार हमारा परिचय कराया तो हमारे बीच कुछ भी समानताएं नहीं थी, लेकिन हमें एक-दूसरे में एक ऐसा साथ मिला जिसकी हमने उम्मीद ही नहीं की थी।
उन दिनों डेटिंग का कोई कॉन्सेप्ट नहीं था। हम अपने परिवारों के साथ आपस में कुछ गिने-चुने बार मिले और कुछ महीने बाद शादी कर ली। यह हमारी इच्छा के अनुसार एक साधारण कोर्ट मैरिज थी, बिना किसी तामझाम के – हम पैसे बचा रहे थे। साल के अंत में, जब हम खर्चा उठाने लायक हो गए, हमने अपने फ्रेंड्स और फैमिली के लिए एक बड़ी पार्टी रखी। हम किसी भी तरह का कोई भी कर्जा नहीं उठाना चाहते थे। हमारे बीच में यह एक बड़ी समानता थी।
जब मैं पहली बार उनके परिवार से मिली, तो वे मुझसे बहुत प्यार से मिले, काफी सज्जन प्रतीत हुए, लेकिन वे मेरे परिवार से कहीं अधिक पारंपरिक थे। उन्होंने मुझे अपने परिवार के बारे में सब कुछ बताया, कैसे हमें एक दूसरे को समझने और एक साथ एडजस्ट करने में थोड़ा समय लगेगा, क्योंकि उनके लिए भी एक कामकाजी बहू का विचार नया था। वे एक ऐसी बहू की आशा लगाए बैठे थे जो खाना पकाती, सफाई करती, उनके पैर दबाती – वो सब करती जो एक घरेलु औरत का कर्तव्य माना जाता है। उनकी अपेक्षाओं पर खरा उतरने की, उनकी देखभाल करने और हमारे जीवन को खुशहाल बनाने की मैंने पूरी कोशिश की, लेकिन फिर भी हमारे घर में हमेशा तनाव का माहौल रहता था।
हालांकि, एक गायनोकोलॉजिकल सर्जन के रूप में, मुझे अपनी जॉब में बहुत सफलता और खुशी मिली, लेकिन मैं पिछले 30 सालों से परंपरा और महत्वाकांक्षा नामक दो नावों पर एक साथ सवारी कर रही हूं। हर उस भारतीय महिला की तरह, जिसका जीवन सामाजिक अपेक्षाओं से बुना हुआ है, मेरे व्यक्तिगत बलिदानों की लिस्ट भी मेरी प्रोफेशनल उपलब्धियां से ज्यादा लम्बी है।

मेरे ससुराल वालों ने मुझे (उनके शब्दों में) इस शर्त पर काम करने की अनुमति दी कि मैं अपनी घरेलू ज़िम्मेदारियां पूरी तरह निभाऊंगी। मेरे दिन अस्पतालों और ऑपरेशन थिएटरों के बीच बैलेंस करने में निकल जाते थे, लेकिन फिर भी, मैंने यह सुनिश्चित किया कि, हर सुबह 6 बजे, मेरे ससुर के लिए कड़क चाय से भरा एक फ्लास्क तैयार हो। मेरे ससुराल वालों की नाराजगी तब ज्यादा प्रकट होने लगी जब मैंने अपने पति से अधिक पैसा कमाना शुरू कर दिया। इसके बाद से हालात बदतर होते चले गए।
मेरी आय, जो मेरे काम के प्रति मेरी निष्ठा का एक प्रतिबिंब थी, विवाद का एक प्रमुख मुद्दा बन गई। अगर लोगों को पता चला कि उनके बेटे की पत्नी की कमाई से घर चल रहा है तो उनकी समाज में क्या इज्जत रह जाएगी? मुझे काम करने की क्या जरूरत है? क्या मैं पैसे की इतनी भूखी हूं कि, अपने पत्नी के कर्तव्यों की ‘उपेक्षा’ करते हुए, देर रात तक काम करने को तैयार हूं?
मेरे पति की नौकरी छूट गई क्योंकि उनकी फर्म आर्थिक तंगी के कारण बंद हो गई। उन्होंने शराब पीना शुरू कर दिया; इसकी शुरुआत डिनर के साथ एक बियर से हुई और फिर धीरे-धीरे उनके हाथ में हर समय एक ड्रिंक रहने लगी। वह तनावग्रस्त थे और मैंने उनका तनाव बांटने की पूरी कोशिश की। लेकिन तब पुरुष उतने खुल कर बात नहीं करते थे जितना अब करने लगे हैं। मैंने उन्हें सपोर्ट करना चाहा, लेकिन उनके माता-पिता की अपेक्षा थी कि मैं उनके अहंकार और पब्लिक इमेज की खातिर अपना करियर के साथ समझौता करूं।
मैंने अपने कर्तव्यानुसार हर काम किया; मैंने यह सुनिश्चित किया कि घर का हर काम समय पर हो, सास को पैरों में दर्द हुआ तो मैंने उनके पैर भी दबाए, और बच्चों के स्कूल का काम देखना और परिक्षाओं की तैयारी कराने का जिम्मा भी मैंने ही उठाया। फिर वे मुझसे मेरे करियर पर ब्रेक लगाने के लिए कैसे कह सकते थे? मैं घर में सबसे अधिक कमाने वाली सदस्य थी और मेरी वजह से ही घर चल रहा था, इस बात की सराहना करने के बजाय उनके तानें और बढ़ने लगे। मेरा अपने पति से अधिक पैसा कमाना मेरे लिए एक अभिशाप बनने लगा था।
जल्द ही, अपने पति की शराब की लत के लिए भी मुझे ही बलि का बकरा बना दिया गया, एक ऐसा आरोप जो आज भी कभी-कभी मेरी आत्मा को कचोटता है। मेरा अपने पति से अधिक पैसा कमाना, उनकी नजरों में, मेरे पति को कमजोर बना रहा था। उन्होंने कहा कि मैं परिवार को तोड़ रही हूं।

मेरे पति, मुझे सपोर्ट करने और साथ ही अपने परिवार की इच्छाओं का अनुपालन करने के चक्कर में, अक्सर मेरे संघर्षों में एक मूक दर्शक की तरह खड़े रहते थे। वह मेरा बचाव करने और अपने माता-पिता की निरंतर अपेक्षाओं को पूरा करने के बीच झूलते रहते, मेरी रोजमर्रा की लड़ाई में उनकी उपस्थिति तो थी पर हिचकिचाहट साफ़ नज़र आती थी। फिर भी, मेरा निश्चय कभी नहीं डगमगाया; अदृश्य सामाजिक जंजीरों के बावजूद, अपने करियर और अपने बच्चों के प्रति मेरी प्रतिबद्धता हमेशा दृढ़ रही।
मैं झूठ नहीं बोलूंगी। कई बार मैंने सोचा कि घर छोड़ के चली जाऊं, ये शादी तोड़ दूं। ऐसे माहौल में, ना तो मैं रहना चाहती थी और ना ही मैं अपने बेटों को यह सोचते हुए बड़ा होने देना चाहती थी कि उनके दादा-दादी की सोच सही थी। बच्चों को जेनरेशन के इस फर्क को समझाने के लिए मैं हर समय उनके आसपास नहीं होती थी। अपने सास-ससुर के प्रति अपने गुस्से को शांत करने के लिए मैं ना जाने कबसे खुद को यही बात समझाती आ रही हूं। लेकिन तलाक कोई आसान विकल्प नहीं था। कहीं न कहीं, मैं भी इन्हीं आदर्शों की गुलाम थी जिनके साथ मैं बड़ी हुई थी कि विवाह एक अटूट बंधन है। मैं चाहती थी कि मेरे बच्चों के जीवन में उनके माता-पिता दोनों हों, साथ ही दादा-दादी भी हों, और हमारे अलग हो जाने से यह सब बर्बाद हो जाता। अब सोचती हूं तो लगता है कि जो लोग केवल अपने बच्चों की खातिर एक साथ रहते हैं, क्या वे फायदे की बजाय उन्हें ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं। यह साफ दिखाई दे रहा था कि हमारा रिश्ता टूट रहा था, और हमारे बच्चों को भी इस बात का अहसास होने लगा था।
चूंकि मेरे पति हर रात शराब के नशे में डूबे हुए मिलते थे, किसी भी तरह की मदद लेने से इनकार करते थे और अपनी नौकरी को बनाए रखने की कोई कोशिश नहीं कर रहे थे, इसलिए उनके हिस्से की पेरेंटिंग का जिम्मा भी मुझे ही उठाना पड़ा। मैं सब कुछ कर रही थी – आर्थिक जिम्मेदारी उठाना, घर संभालना, हर किसी की फिज़िकल और इमोशनल जरूरतों का ख्याल रखना। और मेरे ससुराल वालों ने चाहे जितना भी इसे नकारने की कोशिश की, मेरे पति ने इसे नोटिस किया, और उन्होंने अपने तरीके से इसकी सराहना की।
आखिरकार ट्रेजेडी ने हमारे दरवाजे पर दस्तक दे डाली। शराब के चंगुल में फंसने के कारण मेरे पति को अपने जीवन से हाथ धोना पड़ा, जो एक ऐसा खालीपन दे गया जिसे भरना असंभव हो गया। उनका निधन मेरा व्यक्तिगत नुकसान था, इसके बावजूद भी वह आरोपों का आधार बन गया। परिवार वालों ने, मेरी सफलता और सामाजिक सम्मान पर पीठ-पीछे खूब उंगलियां उठाई, अनुचित रूप से उनके पतन और मौत का जिम्मेदार मेरी महत्वाकांक्षाओं को ठहराया गया। उनके अनुसार, मेरा अपने पति से अधिक पैसा कमाना ही “उनकी असमय मौत का कारण बन गया”।

उनके निधन के बाद मैं करीब एक साल तक उनके मां-बाप के साथ रही, फिर मेरे देवर ने हमारे शहर में शिफ्ट होने का फैसला लिया। घर छोड़ने का दुःख और सही फैसला लेने की उलझन के बीच, मैंने तय किया कि अब अपना घर बनाने का समय आ गया है। उस समय मेरी उम्र लगभग चालीस के आसपास थी और मैं अपने बच्चों के साथ उनका घर छोड़कर अपने छोटे से नए घर में शिफ्ट हो गई।
मेरे बच्चों ने मुझे बहुत हिम्मत दी और मैं कड़ी मेहनत करती रही ताकि उन्हें एक बेहतर भविष्य मिल सके। मैंने उनका समय अपने माता-पिता और सास-ससुर के बीच समान रूप से बांटा, क्योंकि वे तब भी हमारा परिवार थे और आज भी हैं। लेकिन जो कुछ भी हुआ उसके लिए अब मैं उन्हें मुझे दोषी ठहराने की इजाजत नहीं देती।
मुझे यह समझने में काफी समय लगा कि मेरी नौकरी को अपनी पहचान का इतना बड़ा हिस्सा बनाने में मैंने कुछ भी गलत नहीं किया। मुझे लोगों की मदद करना पसंद है, और अगर महिलाओं का करियर के प्रति फोकस होना कुछ लोगों को अस्वीकार्य है, तो मैं अपने विद्रोह के साथ संतुष्ट हूं। पुरुष लगातार महत्वाकांक्षाओं और करियर की होड़ में लगे रहते हैं; अब समय आ गया है कि हम उन्हें कड़ा मुकाबला दें। ‘लोग क्या कहेंगे’, इस एक कथन के पीछे इस देश में ना जाने कितने टैलेंट बर्बाद हो रहे हैं।
मैं जानती हूं कि इस संघर्ष में मैं अकेली नहीं हूं जहां सामाजिक नियम हमारे सपनों पर हावी हो जाते हैं। मैं हमेशा उन लोगों का सम्मान और समर्थन करूंगी जो बलिदान और अटूट दृढ़ निश्चय की मिसाल हैं। यह हम महिलाओं की हठ है जो विपरीत परिस्थितियों के बावजूद अपना रास्ता बनाती हैं, और हमारे समाज को आज इस मुकाम पर पहुंचाने में महिलाओं का बहुत बड़ा योगदान है। मेरे ससुराल वाले (मैं हमेशा उनके भले की कामना करती हूं) पूरी तरह से दोषी नहीं हैं। बड़े होते हुए उन्हें यही सिखाया गया होगा। मैं केवल यही चाहती थी कि वे मेरी बात सुनने और समझने की कोशिश करते। समय बदलता है, लोग बदलते हैं और हमें उनके साथ बदलने की जरूरत है।
यह सारा हुसैन को बताया गया, एक गुमनाम अकाउंट है।




