"शादी के कई सालों बाद, झगड़े के लिए न तो वक़्त बचता है न एनर्जी"
एक लेखिका का अपना अनुभव, साथ में कपल्स के आपसी कम्युनिकेशन को और बेहतर बनाने के लिए साइकोलोजिस्ट की सलाह
शादी से पहले अपने कोर्टिंग पीरियड में, बात करने को इतना कुछ था कि एसटीडी कॉल्स और मेसेजेस के चलते, एक ही महीने में सेलफोन का बिल 12,000 आ गया। बेशक़, मैंने पहले ही उसे कह दिया, शेयर करना पड़ेगा…
हमारी यह लॉन्ग-डिस्टेंस रिलेशनशिप करीब डेढ़ साल तक चली, और फिर शादी हो गई, तब मैं 28 साल की थी।
शुरूआती कुछ सालों में, मुझे कभी नाप-तोल कर बात करने की ज़रुरत महसूस नहीं हुई, जो भी मेरे मन में आता मैं बेझिझक अपने पति से कह देती। फिर चाहे किसी बात पर गुस्सा आ रहा हो या चिड़ मच रही हो, कभी खुद को अपने भाव व्यक्त करने से नहीं रोका।
हालांकि, हमारे झगड़े किसी बड़े मुद्दे पर न होकर, ज़्यादातर किसी एक की राय पर आपसी मतभेद या छोटी-मोटी नोंक-झोंक तक ही सीमित थे।

लेकिन, शादी के कई साल बीत जाने पर, परिस्थितियों और नज़रिए दोनों में बहुत बदलाव आ जाता है।
एक तो, आपके पास अपने पार्टनर को साइलेंट ट्रीटमेंट देने का ऑप्शन ही नहीं बचता, खासकर तब, जब आप एक जॉइंट फैमिली में रहते हों। डेटिंग के दौरान, कभी-कभी नाराज़गी में हम तीन चार दिनों तक एक दूसरे से बात ही नहीं करते थे।
अब तो यह चॉइस ही नहीं होती, पति, बच्चों और सास-ससुर के साथ, ना जाने कितना कुछ होता है सलाह-मशवरा करने के लिए।
खाना क्या बनाएं? ऑफिस से घर कब आओगे? बच्चों का होमवर्क आज तुम चेक कर लोगे?
आख़िरकार, अपने आत्मसम्मान को गटक कर बात करनी ही पड़ती है। इसलिए, कभी-कभी सोचती हूं कि बाद में अपनी नाक नीची कर के बात करने से अच्छा है, हम झगड़े ही नहीं।
बहस करना और भी मुश्किल हो जाता है जब बच्चे बड़े होने लगते हैं, क्योंकि वह भी उस झगड़े का हिस्सा बनने लगते हैं, कभी-कभी तो वह हमारे ही मां-बाप बन जाते हैं।
“कोई बात नहीं, मम्मा, पापा का वह मतलब नहीं था, उन्होंने जानबूझ कर ऐसा नहीं किया।”
मन में उपजी हर बात को पहले फ़िल्टर करना और मुँह से निकलने वाले एक-एक शब्द पर ध्यान देना, क्योंकि इसका प्रभाव बच्चों पर पड़ता है। सच कहूं तो, इस सब में या तो गुस्सा ही ठंडा हो जाता है या फिर आप बातों को नज़रअंदाज़ करने लगते हैं। उन बातों को भी, जिनपर आप आज से कुछ सालों पहले बेझिझक लड़ पड़ते थे।

डेटिंग और शादी के बीच का सबसे बड़ा फर्क यह है कि जैसे-जैसे आपकी जिम्मेदारियां बढ़ती हैं, आप अपने पार्टनर की बढ़ती जिम्मेदारियों को भी समझने लगते हैं। कहीं ना कहीं, आपको भी यह अहसास रहता है कि वह ना जाने कितने स्ट्रेस और डिमांड से हर रोज़ जूझता है।
तो भले ही उस पल आपको उस पर बहुत गुस्सा आ जाए, लेकिन फिर बहुत जल्द उससे सहानुभूति भी होने लगती है।
और तो और, झगड़े को बरक़रार रखने के लिए एनर्जी और स्टेमिना दोनों की बहुत ज़रुरत पड़ती है, पूरा दिन ऑफिस में काम, ट्रैवलिंग की भाग-दौड़ और बच्चों से डील करने के बाद, किसके पास यह लक्ज़री है की वो लड़ भी ले?
अब, इस सब का सामना करने के लिए, मैंने अपने कुछ तरीके ईजाद कर लिए हैं।
जब नज़रअंदाज़ करना मुश्किल हो, और बात करना बहुत ज़रूरी हो जाए, तो मैं अपने मन की हर बात अपने पार्टनर को एक मैसेज में लिख के भेज देती हूं।
उसे भी यह ठीक लगता है, क्योंकि कभी-कभी आमने सामने बहस करने से, और खुद की बात को सही साबित करने में आप गुस्से में आ जाते हो और जो आप कहना या समझाना चाहते थे, उसका मतलब ही बदल जाता है।
कई बार, मैं सिर्फ इस निराशा में ही रो पड़ती थी क्योंकि मैं खुद को अभिव्यक्त तो करना चाहती थी पर सही शब्द ही नहीं मिलते थे…

कुछ मसले ऐसे भी होते हैं जो मुझे पता है कि उसकी समझ से परे हैं या जिन पर बहस करने से कोई फायदा नहीं, उस स्थिति में, मैं अपनी सारी भावनाएं अपने फ़ोन में लिख देती हूं, जैसे कोई जरनल।
और फिर उसे डिलीट कर देती हूं।
टाइपिंग के दौरान मुझे लगता है कि जैसे मैंने अपने मन की सारी भड़ास निकाल दी हो, और फिर उसे डिलीट करने के बाद मैं काफी राहत महसूस करती हूं।
यदि मेरे पास यह छोटे-मोटे जरिए नहीं होते तो शायद मैं फ़्रस्ट्रेशन से मर ही जाती। मैं तो उसे भी यही कहती हूं, “अगर मैं किसी भी तरह तुम से अपनी बात नहीं कह पाउंगी, तो यह हम सबके लिए एक प्रॉब्लम बन जाएगी।”
झगड़े के लिए समय निकालें
एमपावर-द सेंटर, मुंबई की क्लीनिकल साइकोलोजिस्ट, कृतिका धरिआ बताती हैं, “आपसी कम्युनिकेशन में कमी, दूसरे की बात को नज़रअंदाज़ करना, इमोशनल ब्लैकमेल, अविश्वास और इंटिमेसी की कमी जैसी कई आम समस्याओं के साथ, बहुत से कपल्स मेरे पास आते हैं।”
उनका मानना है यह रिलेशनशिप्स में बहुत कॉमन हो गया है।
वह समझाती हैं, “इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपका रिश्ता 40 साल पुराना है, या आपको अभी प्यार हुआ है, यह समस्याएं और इनके समाधान नहीं बदलते। ज़्यादातर रिश्ते नीरस हो जाते हैं, यही वजह है कि दोनों पार्टनर एक दूसरे से खिंचे-खिंचे और दूर होने लगते हैं।”
गर्दन तक काम में डूबे कपल्स के लिए, धरिआ के पास एक सलाह है – एक दूसरे का आमना-सामना करें, झगड़े का हल ढूंढें और अपने रिश्ते में रोमांस को बरक़रार रखें।
आमना-सामना हो तो: “मैं” ज़्यादा, “तू” कम
आप किसी भी तरह के झगड़े की शुरुआत ही क्यों करेंगे, यदि आप करवट बदल के, आँख बंद कर के जो हुआ उसे आसानी से भूल सकें?
धरिआ इस बात से सहमत नहीं हैं, प्रॉब्लम का पता लगाना और उसका सामना करना अनिवार्य है, पर विषय को उचित तरीके से हैंडल करना उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है।

सारा दोष अपने पार्टनर पर मढ़ देना या अनुचित शब्दों से सम्बोधित करना, ज़्यादातर झगड़े की शुरुआत ऐसे ही होती है।
धरिआ कहती हैं, “अपने पार्टनर को हमेशा दोषी ठहराना, उसे सिर्फ डिफेंसिव बनाएगा, यह ह्यूमन ब्रेन का किसी भी अटैक के प्रति ऑटोमैटिक रेस्पॉन्स होता है।”
इस स्थिति से बचने के लिए, पहला स्टेप यह है कि ऐसे वाक्यों का इस्तेमाल करें जो ‘मैं’ से शुरू हो नाकि ‘तू’ से, यह तरीका बहुत कारगर है।
“जैसे, ‘तुम मुझे बहुत अनकम्फ़र्टेबल महसूस कराते हो’ कि जगह ऐसा कुछ कहें, ‘मैं बहुत अनकम्फ़र्टेबल महसूस कर रही हूँ क्योंकि..’।”
झगड़े सुलझाना हो तो: सही प्रश्न उठाएं
सीधे निष्कर्ष पर पहुँचने की अपनी स्वाभाविक चाह को रोकें और शुरुआत खुद से सवाल पूछते हुए करें।
सबसे पहले यह समझना कि आख़िर प्रॉब्लम की जड़ क्या है, उसका हल निकालने की प्रक्रिया को आसान बना देगा।
“वह कोई माइंड रीडर तो है नहीं जो मेरा मन पढ़ ले” – यह प्रैक्टिकल सोच लोगों की अपने पार्टनर से अवास्तविक उम्मीदें लगाने की आदत पर रोक लगाएगी।

वह कहती हैं, “हमारे बीच में इतने झगड़े क्यों होते हैं? मुझे अपने पार्टनर के साथ ख़ुशी और लगाव कब महसूस होता है? हम दोनों को एक-दूसरे की कौनसी बातों से चिढ़ होती है? मैं अपने पार्टनर के साथ अपने कम्युनिकेशन में किस तरह का बदलाव लाना चाहूंगी जिससे वह और बेहतर हो? इन सवालों का जवाब ढूंढने से आप अपनी रिलेशनशिप को एक निष्पक्ष नज़रिए से देख पाएंगी।
रोमांस को बरक़रार रखने के लिए: बिना बोले भी बहुत कुछ कहा जा सकता है
किसी भी झगड़े से डील करने का बेस्ट तरीका है, उसे शुरू होने से पहले ही ख़त्म कर दो।
पर यह तो हमारा गूगल मैप भी नहीं बता सकता कि हमारी बातें कब कौनसी राह पकड़ लेंगी, तो दूसरा बेस्ट तरीका है – अपने रोमांस को बरक़रार रखें।
ऐसे बहुत से तरीके हैं, जिनसे आप अपने पार्टनर पर यह जाहिर कर सकें कि आप उसे कितना प्यार करते हैं।
धरिआ कहती हैं, “यह ज़रूरी नहीं कि कम्युनिकेशन हमेशा बातचीत से ही होता है। फिज़िकल टच भी आवश्यक है, पर यह सिर्फ़ सेक्स या इंटीमेट होने तक ही सीमित नहीं है। कभी-कभी उसे अचानक से गले लगा लेना, गाल सहला देना या अपने पार्टनर से चलते-फिरते जानबूझकर टकरा जाना भी आपके रिश्ते को बेहतर बनाने में बहुत कारगर साबित होता है।”

लोगों से भरे एक कमरे में भी, एक दूसरे को आँखों ही आँखों में इशारे करना या सिर्फ उसका आश्वस्त करते हुए गर्दन हिला देना भी ट्रिक कर सकता है।
“इस तरह की हल्की-फुल्की सी छेड़छाड़, ऑक्सीटोसिन हार्मोन बनाती है, जो आपके और आपके पार्टनर को एकसाथ छोटी-छोटी खुशियां बांटने में मदद करती हैं।”
उनके लिए जो अभी भी इस सोच में हों की शुरुआत कैसे की जाए, धरिआ की सलाह है कि आप गैरी चैपमैन की फाइव लैंग्वेजेज़ ऑफ़ लव से सीख लें – ऐफ़र्मेशन शब्द, सेवा-भाव, तोहफों का लेनदेन, साथ में क्वालिटी टाइम और फिज़िकल टच।
वह समझाते हुए कहती हैं, “पहला कदम, अपने पार्टनर से बात करने के साथ उठायें, और जानने की कोशिश करें की आप दोनों के लिए इन पांच केटेगरी के क्या मायने हैं और फिर आगे बढ़े।”
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