'मेरे IVF के सफर के दौरान मुझे कई बार ऐसा लगा जैसे मैं कन्वेयर बेल्ट पर रखी कोई वस्तु हूं'
फर्टिलिटी ट्रीटमेंट्स में विशेषज्ञता के साथ-साथ समवेदना भी आवश्यक है
फिल्म ‘गुड न्यूज़’ का यह सीन जिसमें करीना कपूर खान IVF और प्रेगनेंसी को लेकर अपने विचार प्रकट करती हैं, सीधे आपके जेहन पर चोट करता है और उनकी हर बात दिल को छू जाती है। IVF के दौरान लगने वाले हार्मोन के इंजेक्शन के कारण मूड स्विंग और एंग्जायटी का बढ़ना, बालों का झड़ना, मुंहासे निकलना और प्रेगनेंसी के दौरान यूरिन पर नियंत्रण न कर पाना जैसी कठोर वास्तविकताओं को खुलकर उजागर करके उन्होंने ना जाने कितनी महिलाओं के दिल की बात सामने रखी जो चुपचाप यह सब सहती रहती हैं और उफ़ भी नहीं कर पाती। और इन सब के बावजूद, महिलाओं से मुस्कुराने की उम्मीद की जाती है।
IVF की प्रक्रिया आपको भावनात्मक और शारीरिक रूप से थका सकती है, और इस दौरान महिलाएं अक्सर गहरी एंग्जायटी का अनुभव करती हैं। हालांकि पोस्टपार्टम डिप्रेशन पर चर्चाएं अब काफी आम हो गई हैं, लेकिन एक्सपर्ट्स का मानना है कि मेंटल हेल्थ की जांच बहुत पहले से शुरू की जानी चाहिए, यहां तक कि फर्टिलिटी ट्रीटमेंट के दौरान भी इसे शुरू किया जाना चाहिए। IVF पर उपलब्ध एक रेडिट थ्रेड में, कई महिलाओं ने बताया कि उन्होंने इस चिंता में हफ़्ते बिता दिए कि उनका एग फर्टिलाइज़ होगा या नहीं, उन्हें कितने एम्ब्रोयो मिलेंगे, या एक भी मिलेगा या नहीं। कई महिलाओं का कहना था कि उनके आसपास के लोग अक्सर फर्टिलिटी ट्रीटमेंट्स के बारे में बात करते समय असंवेदनशील प्रतीत होते हैं।
मुंबई स्थित, लूमा फर्टिलिटी की फाउंडर और आन्ट्रप्रनर, नेहा मोटवानी इस एंग्जायटी से भली-भांति परिचित थी और यह उनके खुद के IVF क्लिनिक खोलने से कई साल पहले की बात है। 2013 में शादी होने के बाद, 2020 तक नेहा को संतान पैदा करने की कोई चाह नहीं थी। वे कहती हैं, “मुझे नहीं पता कि मेरा मन कैसे बदल गया। शायद यह बदलाव पैंडेमिक के दौरान आया।” उन्होंने 34 वर्ष की आयु में प्रेगनेंट होने के लिए प्रयास शुरू किए और जब जांच में उनके AMH (ऐंटी-म्यूलेरिअन हॉर्मोन) लेवल कम पाए गए, तो उन्होंने 35 वर्ष की आयु में IVF कराने का निर्णय लिया।
अब जब वे पीछे मुड़कर देखती हैं, उन्हें लगता है कि काश उन्होंने अपनी बीस की उम्र में ही अपने एग फ्रीज़ करवा लिए होते, जब महिलाओं की फर्टिलिटी चरम पर होती है। “अपने एग सरंक्षित करने से मुझे बायोलॉजिकल स्वतंत्रता मिलती और जीवन में आगे चलकर मेरे पास ज़्यादा विकल्प होते।” (अगर आप अपने एग फ्रीज़ करवाने की सोच रही हैं, तो जानकारी के लिए यह जरुर पढ़ें।)और शायद यह उन्हें IVF के उस बुरे अनुभव से बचा लेता जो उन्होंने सहन करना पड़ा।

बेबी बंप तक का मुश्किल सफर
2021 से 2023 के बीच, IVF की तीन साईकल करवाने के बाद मोटवानी को आखिरकार बच्चा हुआ। हर साईकल में कई IUI, एग रिट्रीवल और एम्ब्रोयो ट्रांसफर की प्रक्रियाओं से गुज़रने के बाद, वे भावनात्मक और शारीरिक रूप से काफी परेशान हुई। लेकिन सबसे ज्यादा तकलीफदेह था – फर्टिलिटी क्लीनिकों में मिलने वाला ठंडा, अमानवीय और अक्सर उपेक्षापूर्ण व्यवहार। मोटवानी कहती हैं, “क्लीनिकों में बिना किसी स्पष्टीकरण के लंबे समय तक इंतजार करना पड़ता था और अगर हममें से कोई आपत्ति जताता, तो कर्मचारी बुदबुदाते थे कि हमने बच्चा पैदा करने में इतना लंबा इंतजार क्यों किया।”
जो औरतें मां नहीं बन पाती, वे वैसे ही उपेक्षा और शर्मिंदगी की शिकार होती हैं, तो कम से कम यहां तो ये महिलाएं थोड़ी दया और शिष्टाचार की उम्मीद करती हैं। लेकिन इसके बजाय, मोटवानी ने खुद को एक ऐसे सिस्टम में खड़ा पाया जहां महिलाओं को, जो पहले से ही असुरक्षित महसूस कर रही थी और जिन्हें देखभाल की ज़रूरत थी, असुविधा के रूप में देखा जा रहा था। वह कहती हैं, “मुझे ऐसा लगता था जैसे मैं किसी कन्वेयर बेल्ट पर रखी कोई वस्तु हूं, हमें जानवरों की तरह बिना किसी समवेदना के इधर से उधर धकेला जा रहा था।” कुछ मौकों पर उन्होंने यह भी देखा कि अपने एग फ्रीज कराने आईं इच्छुक महिलाओं से उनके पति का नाम लिखने को कहा जाता था, बिना ये सोचे कि वे अविवाहित हो सकती हैं।
पूरे इलाज के दौरान, मोटवानी लगभग हर दिन अपने पति से सिस्टम की खामियों के बारे में शिकायत करती थीं। वे कहती हैं, “इस प्रक्रिया में अच्छे-खासे प्रोजेक्ट मैनेजमेंट की ज़रूरत थी, जिसमें अपने टेस्ट, स्कैन और अपॉइंटमेंट्स का समन्वय करना भी शामिल था। यह एक फुल-टाइम जॉब जैसा लगता था।” उन्हें इस बात से तकलीफ होती थी कि IVF के दौरान महिलाओं को अपने नियमित शेड्यूल को रोककर कई दिनों तक लगातार क्लिनिक जाना पड़ता था और इंजेक्शन लगवाने के लिए घंटों इंतज़ार करना पड़ता था। मोटवानी को समझ में आया कि इससे महिलाओं पर कितना बुरा असर पड़ सकता है और उनके लिए, खासकर वर्किंग वूमेन के लिए, उनकी वर्कप्लेस पर कितनी मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। वे सोचती थीं कि ये क्लिनिक घर पर इलाज की सुविधा क्यों नहीं देते।

पीड़ा को अपनी ताकत में बदला
अंततः उनके पति ने उन्हें अपनी कुंठा को सही दिशा में लगाने और कुछ रचनात्मक करने के लिए प्रोत्साहित किया। खासकर इसलिए क्योंकि यह उनका ऐसा पहला अनुभव नहीं था। कई साल पहले, एक अच्छी योगा क्लास की तलाश में काफी संघर्ष करने के बाद भी जब उनका अनुभव अच्छा नहीं निकला था तो उन्होंने फिटर्निटी की स्थापना की, जो एक फिटनेस एग्रीगेटर था और जिसे बाद में कल्ट ने ले लिया।
लेकिन सबसे पहले मोटवानी यह समझना चाहती थीं कि उनका अनुभव व्यक्तिगत था या अन्य महिलाएं भी इस समस्या से जूझ रही थीं। अपने दोस्तों और उनके दोस्तों के माध्यम से, उन्होंने देशभर में करीब 200 ऐसी महिलाओं से बात की, जिन्होंने फर्टिलिटी ट्रीटमेंट करवाया था। और उनमें से हर एक ने अपने IVF के सफर में किसी न किसी चरण पर अमानवीय व्यवहार का अनुभव करने की बात कही। इसके बाद मोटवानी ने भारत भर में करीब 50 क्लीनिकों का दौरा किया ताकि यह पता लगा सकें कि व्यवस्थाएं किस प्रकार संरचित हैं और मरीज़ों को किन परिस्थितियों में तकलीफों का सामना करना पड़ता है। उन्होंने पाया कि इनमें से बहुत कम क्लीनिक मरीजों के साथ देखभाल और समवेदना से पेश आने के लिए प्रशिक्षित थे।
इस अंतर को पाटने के लिए, उन्होंने 2024 में मुंबई में लूमा फर्टिलिटी की स्थापना की। उनका मूल उद्देश्य फर्टिलिटी ट्रीटमेंट्स से जुड़े अनुभव को फिर से परिभाषित करना था ताकि रोगियों के आराम और मानवता को प्राथमिकता देते हुए उनका इलाज किया जा सके।
IVF का एक अधिक सौम्य अनुभव
लूमा फर्टिलिटी में, मरीजों को अलग-अलग कमरों और प्रक्रियाओं से गुजरने की आवश्यकता नहीं होती है। क्लिनिक मरीजों के अपॉइंटमेंट को इस तरह से डिज़ाइन करता है कि कंसल्टेशन, ब्लड टेस्ट्स और निर्धारित इंजेक्शन सहित लगभग सभी स्टेप एक ही कमरे में पूरे हो जाते हैं, और मरीज पूरी प्रक्रिया के दौरान आराम से बैठे रह सकते हैं। अल्ट्रासाउंड रूम में ही वॉशरूम की सुविधा दी गई है जिसमें पेशेंट के लिए पैड और टैम्पोन भी उपलब्ध हैं, वैसे तो यह एक छोटी सी बात है लेकिन अधिकांश अन्य क्लीनिकों में इस पर ध्यान नहीं दिया जाता।
प्रत्येक मरीज़ को एक केयर नेविगेटर प्रदान किया जाता है जो साइकोलॉजी बैकग्राउंड से होता है, ताकि वह पेशेंट के इमोशनल और एडमिनिस्ट्रेटिव भार को संभालने में उनकी मदद कर सकता है। अपॉइंटमेंट रिमाइंडर, इंजेक्शन शेड्यूल और टेस्ट अपडेट जैसी नियमित जानकारी को एक ऐप पर ट्रांसफर कर दिया गया है ताकि मानसिक तनाव कम हो सके। ट्रीटमेंट के दौरान, लूमा आवश्यक IVF इंजेक्शन की होम डिलीवरी और उसके एडमिनिस्ट्रेशन की सुविधा भी प्रदान करता है।
मोटवानी बताती हैं, “IVF के दौरान, यह अनिश्चितता कि कितने एग निकाले जाएंगे या प्रक्रिया सफल होगी या नहीं, मेरी एंग्जायटी का एक प्रमुख कारण था।” यही कारण था कि वह चाहती थी की लूमा में पारदर्शिता सबसे महत्वपूर्ण हो। इसलिए, उनकी एम्ब्रियोलॉजी लैब का RI विटनेस सिस्टम, जो एग, स्पर्म और एम्ब्रोयो की सटीक जानकारी सुनिश्चित करता है, क्लिनिक के ऐप के साथ एकीकृत है, जिससे मरीज अपने IVF साईकल में होने वाली हर गतिविधि को ट्रैक कर सकते हैं।
मुख्य चिकित्सा टीम का गठन करते समय भी, मोटवानी ने ऐसे लोगों को नियुक्त करने पर फोकस किया जो एक्सपर्ट होने के साथ-साथ संवेदनशीलता की आवश्यकता को समझते हों। उनका कहना है कि लूमा की एक्सपर्ट टीम—विशेष रूप से मेडिकल डायरेक्टर, डॉ. राधिका सेठ, जो 18 वर्षों के अनुभव वाली एक टॉप की IVF प्रैक्टिशनर हैं—उनकी सोच से पूरी तरह सहमत हैं।
पिछले साल में, मोटवानी कहती हैं कि उन्होंने 25 एम्ब्रोयो ट्रांसफर किए और उनकी संतुष्टि दर 10 में से 9.5 रही है।
IVF की प्रक्रिया में हमेशा अनिश्चितता, कठिन निर्णय और तीव्र भावनाएं शामिल होती है जिन्हें शब्दों में व्यक्त करना मुश्किल है। लेकिन इसमें किसी भी प्रकार का जजमेंट या उपेक्षा नहीं होनी चाहिए। वह कहती हैं, “मेरा बच्चा अब दो साल का है। भले ही देर से सही लेकिन प्रेग्नेंट हो पाना मेरे लिए एक अद्भुत उपहार है। मुझे उम्मीद है कि अन्य महिलाएं भी बिना उस अतिरिक्त तनाव के, जिसका मुझे सामना करना पड़ा, समर्थन और सहानुभूति के साथ अपना फर्टिलिटी का सफर सफलतापूर्वक पूरा कर सकेंगी।”




